मोतिहारी के भवानी मंडप में 115वें वर्ष भी कायम है दुर्गा पूजा की परंपरा
-बंगाली संस्कृति और विरासत का अनूठा प्रतीक है चंपारण का प्राचीन दुर्गा पूजा मंडप
मोतिहारी, 18 अक्टूबर (हि.स.)। देशभर में शारदीय नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की आराधना श्रद्धा और भक्ति के साथ की जा रही है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक देवी पूजा की अलग-अलग परंपराएं देखने को मिल रही हैं। इन्हीं परंपराओं के बीच बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी स्थित भवानी मंडप की दुर्गा पूजा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और एक सदी से अधिक पुरानी विरासत के लिए जानी जाती है। यहां बंगाली समाज ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजते हुए दुर्गा पूजा के आयोजन की परंपरा को आज तक जीवित रखा है।
इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1912 में हुई थी। उस समय चंपारण में बसे कुछ बंगाली परिवारों ने मिलकर मोतिहारी में यादव लाल साह के प्रांगण में पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन किया था। बनारस से आए भट्टाचार्य पुरोहित बंधुओं ने पहले वर्ष पूजा संपन्न कराई। इसके बाद करीब एक दशक तक शहर के अलग-अलग स्थानों पर बंगाली समाज की ओर से दुर्गा पूजा का आयोजन होता रहा।
इसी दौरान नील आंदोलन के समय देशबंधु चितरंजन दास भी मोतिहारी आए थे। उन्होंने यहां के बंगाली समाज को आर्थिक सहायता दी, जिससे दुर्गा पूजा के लिए स्थायी स्थान की व्यवस्था करने में मदद मिली। अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू. एस. इरविन ने भी बंगाली समाज को जमीन उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1922 में मोतिहारी के ज्ञान बाबू चौक स्थित भवानी मंडप में दुर्गा पूजा की परंपरा फिर से स्थापित हुई। हालांकि, वर्ष 1934 के विनाशकारी भूकंप में मंडप क्षतिग्रस्त हो गया, जिसे बाद में स्थानीय लोगों के सहयोग से दोबारा बनाया गया।
आजादी के बाद भवानी मंडप धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बन गया। यहां स्थित चंपारण की प्राचीन बंगाली लाइब्रेरी, वीणापाणि लाइब्रेरी, ने भी इस विरासत को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1960 के दशक तक भवानी मंडप शहर के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों में शामिल हो गया था। यहां मंच बनने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों की परंपरा को भी विस्तार मिला।
भवानी मंडप में पूजा-पाठ, पुष्पांजलि, प्रसाद और भोग के बाद संध्या आरती का विशेष महत्व है। ढाक की गूंज के बीच धुनुची नृत्य का दृश्य श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है और बंगाली संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है।
पिछले एक दशक में चंपारण के इस प्राचीन दुर्गा पूजा मंडप के नवीकरण का काम भी तेजी से आगे बढ़ा है। हालांकि, दूसरी ओर यहां बंगाली परिवारों की संख्या लगातार कम हुई है। बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन का असर मोतिहारी के बंगाली समाज पर भी पड़ा है। अब यहां गिने-चुने बंगाली परिवार ही रह गए हैं। इसके बावजूद वे अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गैर-बांग्लाभाषी कलाकारों की ओर से रवींद्र संगीत की प्रस्तुति भी इस विरासत के विस्तार की एक झलक है।
भवानी मंडप की दुर्गा पूजा की एक खास पहचान देवी की प्रतिमा का स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगार करना है। आयोजकों के अनुसार, यह चंपारण का एकमात्र ऐसा दुर्गा पूजा स्थल है, जहां प्रतिमा को सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। प्रतिमा निर्माण के लिए मूर्तिकार और ढाक बजाने वाले कलाकार बंगाल से बुलाए जाते हैं। पूजा के दौरान प्रतिदिन श्रद्धालुओं को भोग भी परोसा जाता है।
षष्ठी के दिन देवी बोधन से शुरू होकर अष्टमी की संधि पूजा और दशमी के दिन सिंदूर खेला तक भवानी मंडप में बंगाली परंपराओं की अनूठी छटा देखने को मिलती है। उलुध्वनि, शंखनाद, ढाक की थाप और धुनुची नृत्य इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। बंगाली समाज की मान्यता है कि नवरात्र के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और दशमी के दिन विसर्जन के साथ विदा होती हैं। विसर्जन यात्रा में पुरुष, महिलाएं और बच्चे एक साथ शामिल होते हैं। शंखध्वनि और ढाक की गूंज के बीच मां दुर्गा को विदाई दी जाती है।
बंगाली संस्कृति और विरासत की इस परंपरा को आगे बढ़ाने में बंगाली इंस्टीट्यूट और दुर्गा पूजा समिति की अहम भूमिका है। बंगाली इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष डॉ. भास्कर राय और सचिव डॉ. अजीत कुमार हैं। वहीं, दुर्गा पूजा समिति की जिम्मेदारी मणीन्द्रनाथ दास और सहसचिव असीम मुखर्जी संभाल रहे हैं।
एक सदी से अधिक पुरानी भवानी मंडप की दुर्गा पूजा आज भी मोतिहारी और आसपास के क्षेत्र में आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनी हुई है।---------
हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद चौधरी

