संवेदनशीलता की मिसाल, जब सरकारी गाड़ी छोड़ नंगे पांव ही ग्राउंड जीरो पर उतरीं डीएम अलंकृता पांडे

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संवेदनशीलता की मिसाल, जब सरकारी गाड़ी छोड़ नंगे पांव ही ग्राउंड जीरो पर उतरीं डीएम अलंकृता पांडे


संवेदनशीलता की मिसाल, जब सरकारी गाड़ी छोड़ नंगे पांव ही ग्राउंड जीरो पर उतरीं डीएम अलंकृता पांडे


भागलपुर, 11 सितंबर (हि.स.)।

गंगा के बढ़ते जलस्तर ने भागलपुर जिले में बाढ़ की भीषण त्रासदी ला खड़ी की है। संकट के इस दौर में जहां आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है, वहीं प्रशासनिक संवेदनशीलता की एक बेहद सकारात्मक तस्वीर भी सामने आई है।

जिले की जिलाधिकारी अलंकृता पांडे ने दफ्तर के बंद कमरों और आरामदायक कुर्सियों को छोड़कर सीधे बाढ़ की विभीषिका झेल रहे लोगों के बीच पहुंचने का फैसला किया है। उनके इस मानवीय और जुझारू रुख की पूरे जिले में खूब सराहना हो रही है।

उल्लेखनीय है कि बाढ़ के कारण जिले की 86 से अधिक पंचायतों में हाहाकार मचा हुआ है। नवगछिया, शाहकुंड और भागलपुर के शहरी इलाकों सहित कई गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से पूरी तरह कट चुका है। सामान्य वाहनों का इन इलाकों में जाना नामुमकिन हो गया है। लेकिन इन बाधाओं को दरकिनार करते हुए डीएम अलंकृता पांडे खुद ग्राउंड जीरो पर उतरीं। जहां सड़कें पानी में डूब चुकी थीं, वहां उन्होंने ट्रैक्टर को अपनी सरकारी गाड़ी बनाया और जहां पानी और गहरा था, वहां वह नंगे पांव कमर तक पानी में घुसकर पीड़ितों तक सहायता पहुंचाने निकल पड़ीं। उनके साथ शाहकुंड की अंचलाधिकारी (सीओ) हर्षा कोमल भी इस मुहिम में कंधे से कंधा मिलाकर डटी रहीं।

डीएम अलंकृता पांडे ने सिर्फ प्रभावित इलाकों का ऊपरी मुआयना नहीं किया, बल्कि पानी के बीच फंसे परिवारों के पास जाकर खुद उनकी समस्याएं सुनीं।

प्रशासनिक टीम के साथ लगातार निगरानी करते हुए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राहत सामग्री और बुनियादी जरूरतें हर प्रभावित व्यक्ति तक बिना किसी देरी के पहुंचें। वहीं शाहकुंड की अंचलाधिकारी हर्षा कोमल शाहकुंड प्रखंड के खुलनी, पैरडो मोमिन्या माल, बेलथू, खैरा, मकंदपुर और दरियापुर जैसी अत्यधिक प्रभावित पंचायतों में प्रशासनिक टीम ने खुद पहुंचकर लोगों का ढांढस बंधाया।

निरीक्षण के दौरान डीएम ने मौके पर ही अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों को कड़े और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि आपदा की इस घड़ी में कागजी खानापूर्ति के बजाय राहत कार्य धरातल पर दिखने चाहिए।

अधिकारी का इस तरह मुश्किल रास्तों को पार कर अपने बीच पहुंचना ग्रामीणों के लिए महज एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि इस संकट काल में जीने का एक बड़ा हौसला बन गया है। प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि पद चाहे कितना भी बड़ा हो, लेकिन लोगों के दिलों में जगह संवेदनशीलता से ही बनती है। जब सरकारी जिम्मेदारी में इंसानियत की गर्माहट शामिल हो जाती है, तो प्रशासन महज एक व्यवस्था न रहकर जनता का अटूट भरोसा बन जाता है।

अलंकृता पांडे ने आपदा के इस दौर में एक बेहतरीन मिसाल कायम की है कि कैसे एक शीर्ष अधिकारी को संकट के समय अपनी जनता के साथ अग्रिम मोर्चे पर खड़े होना चाहिए। यह कदम न केवल सराहनीय है, बल्कि अन्य लोकसेवकों के लिए भी एक बड़ी प्रेरणा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

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