बेला गोठ में 30 परिवारों के घर नदी में समाए, खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर लोग

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बेला गोठ में 30 परिवारों के घर नदी में समाए, खुले आसमान के नीचे जीवन बिताने को मजबूर लोग


सुपौल, 27 जून (हि.स.)। उत्तर बिहार की जीवनरेखा कही जाने वाली कोसी नदी एक बार फिर अपने रौद्र रूप में है। किशनपुर प्रखंड की दुबियाही पंचायत स्थित बेला गोठ गांव में नदी का कटाव भयावह स्थिति में पहुंच गया है। अब तक करीब 30 परिवारों के घर कोसी की धारा में समा चुके हैं, जबकि कई अन्य घरों पर भी खतरा मंडरा रहा है।

ग्रामीणों के मुताबिक, कटाव की रफ्तार इतनी तेज है कि लोगों को अपना सामान समेटने तक का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। कुछ दिन पहले तक जिन आंगनों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ मलबा और कोसी की गर्जना सुनाई दे रही है। कई परिवार अपनी आंखों के सामने वर्षों की मेहनत और जीवनभर की पूंजी को नदी में बहते देखने को मजबूर हैं।

कटाव से प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुनर्वास की है। जिनके घर उजड़ चुके हैं, उनके पास बसने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है। मजबूरन लोग बचा-खुचा सामान लेकर गांव के ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं।बरसात के मौसम में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हैं।

बच्चों की पढ़ाई बाधित हो गई है, जबकि भोजन, पेयजल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी गंभीर समस्या बन गई हैं।ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कटाव प्रभावित क्षेत्र का दौरा तो किया, लेकिन राहत और बचाव के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बांस की पायलिंग, तट सुरक्षा और अन्य कटावरोधी उपाय किए जाते, तो कई घरों और बड़ी मात्रा में कृषि भूमि को बचाया जा सकता था।कोसी का संकट केवल बेला गोठ तक सीमित नहीं है। किशनपुर प्रखंड की मौजहा पंचायत के बगहा क्षेत्र में भी कटाव तेजी से बढ़ रहा है। वहीं, सरायगढ़-भपटियाही प्रखंड की ढोली पंचायत के सियानी और ढोली गांवों में भी नदी लगातार जमीन काट रही है।

हालात इतने गंभीर हैं कि कई परिवार पूरी रात जागकर नदी की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं, ताकि अचानक कटाव बढ़ने की स्थिति में अपने परिजनों और सामान को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके।हर साल बाढ़ और कटाव की त्रासदी झेलने वाले कोसी क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उन्हें सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि सुरक्षित पुनर्वास, स्थायी कटावरोधी कार्य और भविष्य की सुरक्षा की जरूरत है।इधर, सामाजिक संगठन कोसी नव निर्माण मंच ने भी कटाव प्रभावित परिवारों की स्थिति पर चिंता जताते हुए सरकार से तत्काल पुनर्वास, क्षति मुआवजा, राहत शिविर, तिरपाल, पेयजल, शौचालय और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।बेला गोठ, बगहा, सियानी और ढोली के उजड़े घर आज एक ही सवाल पूछ रहे हैं—आखिर कब तक कोसी हर साल लोगों के सपनों और आशियानों को बहाती रहेगी, और कब तक लोग अपने ही घरों में बेघर होने को मजबूर रहेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र

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