कसौली की खूबसूरती में खो जाएंगे आप, जानें हिमाचल की इस शांत जगह का पूरा सफर
पिछले दिनों छुट्टियों में किसी ऐसी जगह पर जाने की इच्छा थी, जहां मौसम सुहावना हो, अधिक भीड़ भी न हो और खुशी-सुकून के साथ कुछ वक्त बिताया जा सके। काफी विचार-विमर्श के बाद सड़क मार्ग से हिमाचल प्रदेश के कसौली और इसके आसपास घूमना तय हुआ। सुबह सवा सात बजे के करीब सभी गाजियाबाद से रवाना हुए। छह से सात घंटे का रास्ता था, जिसमें बीच में ब्रेक लेते हुए आगे बढ़ना था। हमने ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे से अंबाला कैंट-कालका-परवाणू का रास्ता चुना, ताकि शहर के ट्रैफिक से बच सकें।

दिखे बदलते मौसम के रंग
कसौली समुद्र तल से लगभग 1951 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, लेकिन परवाणू तक चढ़ाई या ऊंचाई का उतना एहसास नहीं होता। धर्मपुर तक सड़कें अच्छी हैं और डबल लेन भी, तो गाड़ियां पूरी रफ्तार से दौड़ती हैं। इसके बाद ही पहाड़ के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए घाटी एवं धौलाधर पर्वत शृंखला का साक्षात्कार होता है। प्रकृति का रंग बदलने लगता है। हल्की, गुनगुनी ठंडक हवा में तैर जाती है। आकाश में बादलों की सूरज के साथ आंख-मिचौली सुहावनी लगने लगती है। एक संकेत मिलने लगता है कि गंतव्य अब दूर नहीं।
दोपहर करीब दो बजे हम निर्धारित स्थान, वृक्षों से घिरे, जंगल के बीच एक सुंदर से रिजॉर्ट में पहुंच गए। शरीर में कहीं से भी यात्रा की थकान महसूस नहीं हो रही थी। हां, लंच का समय हो गया था। लिहाजा थोड़ा सुस्ताने के बाद सभी लोगों ने वृक्षों की छांव में स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया और फिर घंटों वहीं आसपास आसन जमा लिया। मौसम सुहाना था। क्षण में बादलों का झुंड आ रहा था, बरस रहा था और फिर धूप खिल जा रही थी। यहां बारिश का भी अपना आनंद था।

रस्किन की जन्मस्थली
यहां देवदार के सुंदर जंगलों के बीच निर्मल वातावरण को अनुभव करने का एक अलग ही आनंद है। पूरे समय पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। पेड़ों के पत्ते जब आपस में टकराते हैं, तब इनसे भी एक अलग प्रकार की ध्वनि निकलती है। यही कारण है कि कसौली अनेक लेखकों एवं रचनाकारों की कर्मस्थली रही है। पढ़ने-लिखने के शौकीनों को मालूम ही होगा कि कसौली से सुप्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड का गहरा और पुराना संबंध रहा है। 1934 में यहीं के मिलिट्री अस्पताल में उनका जन्म हुआ था। अपने इंटरव्यू में रस्किन ने बताया है कि कैसे उनके जन्म के समय मां अपनी बहन के घर कसौली आ गई थीं। जब वे सात वर्ष के थे, तभी माता-पिता का संबंध टूट गया और वे गुजरात के जामनगर और फिर शिमला चले गए। स्तंभकार-लेखक खुशवंत सिंह का भी यह दूसरा घर था। वर्ष 1956 में प्रकाशित ट्रेन टू पाकिस्तान उपन्यास की प्रेरणा उन्होंने विभाजन के समय पाकिस्तान से कसौली तक के सफर से ली थी। इसके बाद भी कई किताबें लिखीं। उनकी आखिरी पुस्तक द गुड, द बैड एंड द रेडिक्युलस का विमोचन भी कसौली में ही हुआ। खुशवंत सिंह को यहां का सादगीभरा जीवन, प्रदूषण रहित प्राकृतिक वातावरण भाता था। आज भी यहां खुशवंत सिंह की याद में लिटरेरी फेस्ट मनाया जाता है।
गिलबर्ट ट्रेल में नेचर वॉक
अमूमन सभी पहाड़ी शहरों के कुछ खास आकर्षण होते हैं- माल रोड, सनसेट पॉइंट, चर्च, मंदिर आदि। कसौली में भी ये सभी हैं। लेकिन हमने ट्रैकिंग करने और आसपास के ग्रामीण जीवन को देखने का निर्णय लिया। वैसे, तो गांवों में आते-जाते हुए भी ट्रैकिंग हो जाती है। लेकिन कसौली बस स्टैंड से 2 किलोमीटर दूर एक खास ट्रैक विकसित किया गया है, जिसे गिलबर्ट ट्रेल कहते हैं। कसौली क्लब से शुरू होकर करीब 1.5 किलोमीटर का यह ट्रेल एयरफोर्स स्टेशन तक जाता है। यहां ट्रैकिंग करते हुए आप प्रकृति की मनोहारी एवं अद्भुत छटा को करीब से देख सकते हैं। प्रकृति प्रेमी से लेकर बर्ड वॉचर्स का यह पसंदीदा ट्रैक है। हमने भी इसका भरपूर आनंद लिया। चारों ओर घने जंगल, हरियाली, उसके बीच-बीच में खिले हुए मनमोहक फूल, एक जादुई एहसास करा रहे थे। शुरू में रास्ता थोड़ा चौड़ा मिला, लेकिन धीरे-धीरे वह संकरा होता गया। हमारे साथ चलने वाले एक स्थानीय शेफ ने बताया कि कसौली नाम एक खास फूल के नाम पर पड़ा है, जिसे स्थानीय भाषा में कुसमावली कहा जाता है।
हनुमान जी ने रखा था पांव
हर शहर की अपनी कहानी और इतिहास होता है। कसौली का सबसे पहला उल्लेख महाकाव्य रामायण में मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, लक्ष्मण जी के मूर्छित हो जाने पर हनुमान जी जब संजीवनी बूटी युक्त पहाड़ी को लेकर लौट रहे थे, तो यहां स्थित एक पहाड़ी पर उन्होंने अपने पांव रखे थे। उस पैर के आकार वाली पहाड़ी चोटी पर आज एक छोटा-सा मंदिर है, जिसके आसपास बहुत सारे बंदर होते हैं। इसलिए उसे मंकी प्वाइंट भी कहा जाता है। यह कसौली का सबसे ऊंचा स्थान है, जहां से पूरी घाटी के आकर्षक एवं मनमोहक दृश्यों को देख सकते हैं। इस जगह का प्रबंधन और संचालन भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। यहां के लिए एक विशेष परमिट की जरूरत होती है।

कब जाएं?
गर्मियों और सर्दियों के अलावा मानसून सीजन में कसौली जा सकते हैं, क्योंकि यहां हर मौसम का अपना मज़ा है। गर्मियों में तापमान 14 से लेकर 27 डिग्री के बीच रहता है। दिन सुहाना और रातें ठंडक भरी होती हैं।
कैसे जाएं?
देश के किसी भी हिस्से से कालका रेलवे स्टेशन पहुंच सकते हैं। वहां से टैक्सी या अन्य वाहन मिल जाते हैं। अगर बस से जाना चाहते हैं, तो हिमाचल प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बसें कई राज्यों से कसौली के लिए चलती हैं। वैसे, चंडीगढ़ से भी यहां पहुंचा जा सकता है। हवाई जहाज से सफर करने वालों के लिए चंडीगढ़ सबसे करीबी हवाई अड्डा है। वहां से टैक्सी या कैब लेकर कसौली जा सकते हैं।
मनमोहक है बड़ोग
चूर चांदनी पहाड़ियों के बीच, देवदार एवं चीड़ के वृक्षों से घिरा बड़ोग कसौली से 21 किलोमीटर दूर है। यहां भी कमोबेश शांति रहती है। परिवार के संग अच्छा समय व्यतीत कर सकते हैं। डोलनजी बान मोनेस्ट्री में शांति की अनुभूति होती है, तो चूर चांदनी पहाड़ी की चोटी से प्रकृति का विहंगम नजारा देखने को मिलता है। यहां लोग ट्रैकिंग के लिए भी आते हैं। फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए तो यह स्थान जन्नत जैसा होता है। बड़ोग में कई कैंपिंग साइट्स हैं, जहां ठहरा जा सकता है, लेकिन अच्छा तो यही रहेगा कि किसी रजिस्टर्ड कैंप साइट पर ही रुकें। बड़ोग के खास खूबसूरती मानसून में देखते बनती है। जुलाई से सितंबर के बीच अच्छी बारिश होती है। सर्दियों में बहुत ठंडक होती है।
शांत-सुंदर है सुबाथू
दो दिन कसौली प्रवास के बाद हमने करीब के शहर सुबाथू जाने का निर्णय लिया। 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुबाथू को आप एक ऑफबीट डेस्टिनेशन कह सकते हैं। यह भारतीय सेना के 14 गोरखा राइफल्स का रेजिमेंटल सेंटर है। 1800 ईस्वी में नेपाल के गोरखा जनरल यहां शासन करते थे। सुबाथू इलाके में गोरखा किला आज भी उनके साहस और वीरता के प्रतीक के रूप में स्थित है। इस किले का निर्माण 1900 ईस्वी में गोरखा सेना के प्रमुख अमर सिंह थापा द्वारा पाल युद्ध में ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ने के लिए कराया गया था। लेकिन जब यहां गोरखाओं का आधिपत्य खत्म हुआ, तो यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। यहां म्यूजियम के साथ आप ब्रिटिशकालीन आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना देख सकते हैं

