पुष्कर मेला से पतंग महोत्सव तक…नवंबर से फरवरी के बीच इन जगहों पर मनाएं सांस्कृतिक त्योहार
भारत में सर्दियां आते ही यात्रा करना एक उत्सव जैसा हो जाता है. एक हफ्ते आप राजस्थान के रेतीले मैदानों में ऊंटों को परेड करते देख सकते हैं. दिसंबर आते-आते नागालैंड की पहाड़ियों में पारंपरिक संगीत सुन सकते हैं. दिसंबर में ही आपको प्राचीन मंदिर की पृष्ठभूमि में शास्त्रीय नृत्य देखने को मिलेगा. जनवरी में जयपुर में किताबों के शौकीन एक साथ आते हैं और उसी महीने गुजरात का आसमान पतंगों के रंग से भर जाता है.
अगर आपकी छुट्टी का मतलब सिर्फ स्मारकों की लिस्ट बनाना नहीं है, तो नवंबर से फरवरी तक का मौसम भारत के त्योहारों के कैलेंडर को फॉलो करने का है. ये उत्सव आपको वो दिखाते हैं जो गाइडबुक में अक्सर नहीं मिलता. लोग कैसे रहते हैं, वे क्या संजोते हैं और आधुनिक भारत में परंपराएं कैसे जीवित हैं. यहां पांच ऐसे त्योहार दिए गए हैं जिनके लिए आप अपनी सर्दियों की छुट्टी प्लान कर सकते हैं.
पुष्कर ऊंट मेला, राजस्थान
पुष्कर मेला या पुष्कर पशु मेला हर साल पांच दिनों तक चलने वाला एक ऊंट और पशु मेला है. यह दुनिया भर से यात्रियों को अपनी ओर खींचता है. यह राजस्थान के पवित्र शहर पुष्कर में अक्टूबर और नवंबर के बीच लगता है. इसे दुनिया के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक माना जाता है. यह आयोजन रंगीन बाजारों, लोक संगीत, रोमांचक प्रतियोगिताओं और राजस्थानी परंपरा व संस्कृति को दिखाता है.
पशुओं की खरीद बिक्री एक हिस्सा है, लेकिन ‘मटका फोड़’, ‘सबसे लंबी मूंछ’ और ‘दुल्हन प्रतियोगिता’ जैसी रचनात्मक प्रतियोगिताएं कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को शहर में खींचती हैं. राजस्थान पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, हाल के वर्षों में पुष्कर क्लब और विदेशी पर्यटकों की एक टीम के बीच एक फुटबॉल मैच भी हुआ है. पुष्कर झील और ब्रह्मा मंदिर के लिए भी समय निकालें, यह भगवान ब्रह्मा को समर्पित कुछ प्रमुख मंदिरों में से एक है. 2026 का मेला 17 से 24 नवंबर तक है.
हॉर्नबिल महोत्सव, नागालैंड
हाल के वर्षों में हॉर्नबिल महोत्सव ने अपनी गतिविधियों की विविधता और संस्कृति व परंपरा की अनछुए पहलुओं के लिए बहुत ध्यान खींचा है. नागालैंड पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इस महोत्सव की कल्पना साल 2000 में दस दिवसीय पर्यटन प्रचार कार्यक्रम के रूप में की गई थी. यह कोहिमा के पास किसामा हेरिटेज विलेज में आयोजित होता है. नागालैंड सरकार इसे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उसकी जातीयता, विविधता और भव्यता में दिखाने के लिए आयोजित करती है.

इसे कभी कभी “त्योहारों का त्योहार” भी कहा जाता है क्योंकि यह दुनिया को नागालैंड की सांस्कृतिक विविधता देखने और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान का मौका देता है. यह एक ऐसा मंच है जहां रोमांच, खेल, कला, हस्तशिल्प, फैशन, संगीत और साहित्य सब एक जगह मिलते हैं. नागालैंड पर्यटन की वेबसाइट पर दी गई लिस्ट में पर्यटन उत्पादों की प्रदर्शनियां और बिक्री, द्वितीय विश्व युद्ध रैली, अंतरराष्ट्रीय लोइन लूम, अंतरराष्ट्रीय हॉर्नबिल नागा कुश्ती जैसे खेल आयोजन, और नागा किंग मिर्च व अनानास खाने की प्रतियोगिताएं शामिल हैं. महोत्सव का मुख्य आकर्षण हॉर्नबिल संगीत महोत्सव है, जो पूर्वोत्तर के कलाकारों को दिखाता है और कलाकारों व संगीत प्रेमियों को एक साथ लाता है. 2026 का महोत्सव 1 से 10 दिसंबर तक है.
कोणार्क नृत्य महोत्सव, ओडिशा
महान ओडिसी गुरु गंगाधर प्रधान ने मूल रूप से 1986 में कोणार्क नाट्य मंडप में इस महोत्सव की कल्पना की थी. यह भारत के सबसे प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य और सांस्कृतिक उत्सवों में से एक बन गया है. कोणार्क महोत्सव को ओडिशा पर्यटन अन्य सांस्कृतिक संस्थानों के साथ मिलकर आयोजित करता ह. इस महोत्सव को “ओडिशा के समकालीन त्योहारों का अग्रदूत” भी कहा जाता है। यह एक वार्षिक पांच दिवसीय आयोजन है जो कलाकारों को एक साथ लाता है जो भारत के कुछ बेहतरीन शास्त्रीय नृत्य रूपों का प्रदर्शन करते हैं, जिनमें ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम, मणिपुरी और समकालीन शास्त्रीय व्याख्याएं शामिल हैं.
शानदार कोणार्क सूर्य मंदिर इस आयोजन में अविश्वसनीय और जटिल नृत्यों के लिए पृष्ठभूमि बनता है. ओडिशा पर्यटन के अनुसार, यह महोत्सव हर साल 1 से 5 दिसंबर तक आयोजित होता है. शाम को नृत्य के साथ दिन में मंदिर घूमने जाएं, फिर चंद्रभागा बीच की ओर बढ़ें, जहां लगभग उसी समय अंतरराष्ट्रीय सैंड आर्ट फेस्टिवल होता है. 2026 के लिए तारीखें 1 से 5 दिसंबर हैं.
जयपुर साहित्य महोत्सव, राजस्थान
हर त्योहार में ढोल, नृत्य या गहनों से सजे ऊंट की जरूरत नहीं होती. कभी कभी आपको बस एक अच्छी किताब और एक ऐसी बातचीत चाहिए जो आपको दुनिया को अलग तरह से देखने पर मजबूर करे. जयपुर साहित्य महोत्सव गुलाबी शहर को दुनिया भर के लेखकों, कवियों, इतिहासकारों, पत्रकारों, विचारकों और पाठकों के लिए एक मिलन स्थल में बदल देता है. सत्र साहित्य, राजनीति, इतिहास, विज्ञान, समाज और समकालीन संस्कृति को कवर करते हैं, अक्सर बहुत अलग दृष्टिकोणों को एक ही बातचीत में लाते हैं.
असली मज़ा इसकी विविधता में है. आप अपनी सुबह एक उपन्यासकार को कहानी कहने की कला पर चर्चा करते हुए सुन सकते हैं और दोपहर प्रौद्योगिकी के भविष्य पर एक बहस में बिता सकते हैं. सत्रों के बीच, किताबें बेचने वाले स्टॉल होते हैं, नए लेखकों को खोजने का मौका मिलता है और साथी पाठकों के साथ बातचीत होती है। यात्रियों के लिए, यह महोत्सव जयपुर को उसके प्रसिद्ध किलों और महलों से परे अनुभव करने का एक बहाना भी है. पुराने शहर के बाजारों को देखें, प्याज कचौरी और दाल बाटी चूरमा का स्वाद लें, और शहर की जगमगाती वास्तुकला की प्रशंसा करने के लिए एक शाम निकालें. महोत्सव की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इसका 2027 संस्करण 14 से 18 जनवरी तक जयपुर के होटल क्लार्क्स आमेर में है.
मकर संक्रांति और अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव, गुजरात
एक त्योहार के बारे में कुछ अद्भुत रूप से सीधा है जहां मुख्य लक्ष्य एक पतंग को आकाश में उड़ाना और उसे वहीं बनाए रखना है। हर जनवरी में, गुजरात उत्तरायण मनाता है, जो मकर संक्रांति के उत्सवों का स्थानीय नाम है. इस दौरान छतें, छत और खुले स्थान जीवंत पतंग उड़ाने के मैदानों में बदल जाते हैं. अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव विभिन्न देशों के पतंगबाजों को एक साथ लाता है, जिसमें असाधारण आकार, माप और डिजाइन की पतंगें दिखाई जाती हैं. अहमदाबाद इन उत्सवों का अनुभव करने के लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक है, खासकर साबरमती रिवरफ्रंट के आसपास. 2027 का अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव 10 से 14 जनवरी तक साबरमती रिवरफ्रंट पर है.
इन एक्टिविटी का उठाएं लुत्फ
पूरा दिन आसमान की ओर देखते हुए न बिताएं. खाना भी इस मजे का हिस्सा है. तिल गुड़ की मिठाइयां, चिक्की, उंधियू और जलेबी इस मौसम से जुड़े कुछ व्यंजन हैं, हालांकि इसका मेन्यू घरों और क्षेत्रों के अनुसार अलग होता है. छतों पर होने वाले जमावड़े अक्सर पड़ोसियों के साथ खाना बांटने और हालचाल जानने के बारे में होते हैं, जितना कि पतंग उड़ाने के बारे में. इस उत्सव के पीछे एक प्यारा सांस्कृतिक विवरण भी है. मकर संक्रांति पारंपरिक हिंदू सौर कैलेंडर में सूर्य के मकर राशि में संक्रमण को चिह्नित करती है, और भारत के कई हिस्सों में मौसमी बदलाव और फसल उत्सवों से जुड़ी है. यह त्योहार पूरे देश में अलग अलग रूपों में मनाया जाता है, तमिलनाडु में पोंगल से लेकर असम में माघ बिहू तक.

