ज्ञानदाता ही नहीं, विद्यार्थियों के संवेदनशील परामर्शदाता भी बनें शिक्षक : डॉ. शीला सिंह
महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की स्मृति में भारतीय ज्ञान परंपरा और मानसिक स्वास्थ्य पर हुआ विमर्श
गोरखपुर, 20 अगस्त (हि.स.)। महाराणा प्रताप महाविद्यालय जंगल धूसड़, गोरखपुर में राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि की स्मृति में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला के तीसरे दिन गुरुवार को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में मनोवैज्ञानिक परामर्श : परामर्शदाता के रूप में शिक्षक की भूमिका, दायित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोरखपुर के मनोविज्ञान विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. शीला सिंह ने कहा कि शिक्षकों को सिर्फ ज्ञानदाता ही नहीं बल्कि विद्यार्थियों के लिए संवेदनशील परामर्शदाता भी बनना होगा।
डॉ. शीला सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति का समग्र विकास करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी शिक्षा को अनुभवपरक, व्यावहारिक एवं समग्र बनाने पर बल देती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सैद्धांतिक ज्ञान पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है, लेकिन विद्यार्थियों के सीखने की प्रक्रिया को अनुभवों से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। अनुभवपरक शिक्षा विद्यार्थियों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़कर सीखने का अवसर प्रदान करती है।
उन्होंने स्व-आकलन को मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह अपनी क्षमताओं का कितना उपयोग कर पा रहा है। इसके साथ ही पारस्परिक संबंधों में उसका व्यवहार कैसा है और सामाजिक हित में उसका योगदान कितना है, इन तीनों पहलुओं का निरंतर आकलन व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समझने और बेहतर बनाने में सहायता करता है।
डॉ. सिंह ने मेटाकॉग्निशन (अधिचिंतन) की अवधारणा को विस्तार से समझाते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने चिंतन के बारे में भी चिंतन करना चाहिए। अपने विचारों एवं भावनाओं को साक्षी भाव से देखने की क्षमता आत्मबोध और आत्मनियंत्रण को विकसित करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में आत्मनिरीक्षण और साक्षी भाव की जो अवधारणा दी गई है, उसका आधुनिक मनोविज्ञान के मेटाकॉग्निशन एवं आत्म-जागरूकता के सिद्धांतों से गहरा संबंध है। उन्होंने कहा कि आज के तनावपूर्ण एवं प्रतिस्पर्धी वातावरण में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील होना शिक्षकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भौतिक विज्ञान विभाग के प्रभारी अभिषेक वर्मा ने कहा कि आज विद्यार्थियों के सामने शैक्षणिक चुनौतियों के साथ भावनात्मक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियां भी हैं। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका केवल विषय-वस्तु का ज्ञान देने तक सीमित नहीं रह सकती। शिक्षक को विद्यार्थियों की इन चुनौतियों को भी समझना और उसके अनुरूप मार्गदर्शन देना होगा।
कार्यक्रम का संचालन मनोविज्ञान विभाग के प्रभारी डॉ. वेंकट रमन ने किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय