गिद्ध संरक्षण के लिए जनभागीदारी जरूरी : डॉ. कन्हैया पटेल
कानपुर, 20 अगस्त (हि.स.)। गिद्ध संरक्षण के लिए केवल वन विभाग या संरक्षण संस्थाओं के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, विद्यार्थियों, युवाओं और आम नागरिकों को भी इस अभियान से जोड़ना जरूरी है। कानपुर प्राणी उद्यान वन्यजीव संरक्षण के साथ पर्यावरण और वन्यजीवों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। यह बातें गुरुवार को कानपुर प्राणी उद्यान के निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल ने अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस की तैयारियों को लेकर आयोजित प्रेस वार्ता में कहीं।
कानपुर प्राणी उद्यान में आगामी पांच सितंबर को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर गुरुवार को जू परिसर में प्रेस वार्ता हुई। इसमें निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) की वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं एडवोकेसी ऑफिसर अलका दुबे मौजूद रहीं।
अलका दुबे ने कहा कि गिद्ध प्रकृति के स्वच्छता प्रहरी हैं। वे मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर पर्यावरण को स्वच्छ रखने के साथ संभावित संक्रमण और बीमारियों के प्रसार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि गिद्धों का संरक्षण केवल एक पक्षी को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा विषय है।
प्रेस वार्ता में गिद्धों की संख्या में गिरावट के मानवजनित कारणों और पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाओं के खतरों पर भी चर्चा हुई। डाइक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक, केटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी दवाओं के गिद्धों पर गंभीर प्रभाव की जानकारी दी गई। अलका दुबे ने पशुपालकों, पशु चिकित्सकों, पैरावेट्स और दवा विक्रेताओं से अपील की कि पशुओं के उपचार में दवाओं का इस्तेमाल वैज्ञानिक सलाह और लागू सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार ही करें तथा गिद्धों के लिए सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दें।
उन्होंने बताया कि वह करीब 14 वर्षों से बीएनएचएस से जुड़ी हैं और गिद्ध संरक्षण तथा वल्चर सेफ जोन से संबंधित वैज्ञानिक जागरूकता एवं एडवोकेसी गतिविधियों में कार्य कर रही हैं।
पांच सितंबर को होने वाले विशेष कार्यक्रम का उद्देश्य गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व, संरक्षण की जरूरत और सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इसमें विद्यार्थियों और युवाओं को विशेष रूप से गिद्ध संरक्षण से जोड़ने के लिए विभिन्न जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। वल्चर सेफ जोन और संरक्षण में आम नागरिकों की भूमिका पर भी जानकारी दी जाएगी।
प्रेस वार्ता के माध्यम से लोगों से गिद्धों को प्रकृति के स्वच्छता प्रहरी और पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण अंग के रूप में समझने की अपील की गई। भारतीय संस्कृति में जटायु को त्याग, साहस और संरक्षण का प्रतीक बताते हुए गिद्ध संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप