श्री काशी विश्वनाथ धाम में ऐप आधारित दर्शन व्यवस्था का कांग्रेस ने किया विरोध

 




कांग्रेस के पदाधिकारी बोले-बाबा विश्वनाथ के दरबार को व्यापार का केंद्र बनाने की कोशिश

वाराणसी, 01 मई (हि.स.)। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में दर्शन-पूजन के दौरान श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मंदिर न्यास ने ऐप-आधारित नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। यह व्यवस्था एक मई से चरणबद्ध तरीके से शुरू की जाएगी। शुक्रवार को इस नई व्यवस्था को लेकर कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।

कांग्रेस के वाराणसी महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे ने इसे आस्था पर प्रहार बताते हुए कहा कि बाबा विश्वनाथ के दरबार को व्यापार का केंद्र बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे काशी की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी। राघवेन्द्र चौबे ने कहा की विश्व की प्राचीनतम जीवंत नगरी काशी, जहां हर गली में शिव का वास माना जाता है, जहां सदियों से संत, महात्मा, विद्वान, तपस्वी और करोड़ों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के चरणों में शीश नवाते आए हैं, वहां अब आस्था को प्रशासनिक आदेशों और डिजिटल बाधाओं में कैद करने की कोशिश की जा रही है। यह काशी की आत्मा पर हमला है । महानगर अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार के इशारे पर मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं एसडीएम मंदिर प्रशासन ने यह व्यवस्था थोपा है।

मीडिया कर्मियों से बातचीत में चौबे ने कहा कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता की चेतना है। यह वह भूमि है जहां मोक्ष की कामना लेकर लोग आते हैं, जहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से भक्त अपने जीवन को धन्य मानते हैं। यहां दर्शन व्यवस्था कभी मोबाइल ऐप, पासवर्ड और तकनीकी जाल पर आधारित नहीं रही। यहां सदियों से श्रद्धा, विश्वास, परंपरा और सरलता ही प्रवेश का माध्यम रही है। लेकिन वर्तमान प्रशासन ने बाबा के दरबार को कॉरपोरेट मॉडल पर चलाने का प्रयास शुरू कर दिया है। मंदिर प्रशासन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी और एसडीएम अपनी सीमाएं भूल चुके हैं। जिन अधिकारियों की नियुक्ति श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और व्यवस्था के लिए की गई थी, वही अधिकारी आज स्वयं को बाबा के दरबार का मालिक समझकर फरमान जारी कर रहे हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी काशी की आस्था, संस्कृति, प्राचीनता और जनाधिकारों की रक्षा के लिए हर संघर्ष करेगी।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी