हेरंब संकष्ठी चतुर्थी पर बड़ा गणेश दरबार में उमड़े श्रद्धालु, अर्ध रात्रि में बाबा का विशेष पूजन
—पुत्र के दीर्घ जीवन के लिए माताओं ने पूरे दिन व्रत रखा,शाम को विधि विधान से भगवान गणेश का पूजन अर्चन
वाराणसी, 31 अगस्त (हि.स.)। भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की हेरंब संकष्टी चतुर्थी (बहुला चौथ) पर सोमवार को काशी विश्वनाथ की नगरी प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आराधना में लीन रही। संतान की दीर्घ आयु और परिवार में सुख शान्ति के लिए व्रत रख महिलाएं सुबह से ही लोहटिया स्थित बड़ा गणेश मंदिर में दर्शन पूजन के लिए पहुंचती रहीं। दरबार में जय गणेश के जयकारे के साथ हर-हर महादेव का जयघोष भी गूंजता रहा। इसके पहले ब्रह्म मुहूर्त में भगवान गणेश के विग्रह को पंचामृत से स्नान कराकर नूतन वस्त्र पहनाए गए और भोग आरती के पश्चात श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के कपाट खोल दिए गए।
मंदिर और आसपास के इलाके में महिला श्रद्धालुओं के चलते मंदिर से लोहटिया तक यातायात को सुचारू रूप से चलाने में यातायात पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। बड़ा गणेश मंदिर के अलावा चिंतामणि गणेश (सोनारपुरा), ढुंढिराज गणेश (विश्वनाथ गली), दुर्ग विनायक (दुर्गाकुंड), दूध विनायक (जतनबर) आदि गणेश मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। दर्शन पूजन के बाद व्रती महिलाओं ने शाम को भगवान गणेश का विधि-धान से पूजन कर चंद्रोदय होते ही अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया। बताते चले हेरंब का अर्थ 'बड़ा सिर' है, आमतौर पर यह भगवान गणेश के पांच सिर वाले और दस भुजाओं वाले रूप को दर्शाता है। हेरंब रूप में गजानन को 'पंचमुख गणपति' कहा जाता है। मान्यता है कि हेरंब संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा पढ़ने या सुनने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन गणेश जी की पूजा करने से संकटों से मुक्ति और भय का नाश होता है
लोहटिया स्थित बड़ा गणेश मंदिर के महंत कैलाश नाथ दुबे ने बताया कि भाद्रपद माह में पड़ने वाला यह व्रत महिलाएं पुत्र की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए रखती है। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा को पंचामृत से स्नान कराकर नूतन वस्त्र पहनाए गए। और आरती के पश्चात श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के कपाट खोल दिए गए तथा अपराह्न में बाबा का विशेष श्रृंगार कर आरती की गई। जिसके बाद श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही जो देर रात तक रही। अर्ध रात्रि में बाबा का विशेष पूजन कर महाआरती की गई।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी