काशी धर्म, संस्कृति और संगीत की नगरी ही नहीं, बल्कि पारंपरिक व स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए विश्वभर में रखता है विशेष पहचान : अभिनेत्री भाग्यश्री

 




बॉलीवुड अभिनेत्री ने लंका चौराहे पर बनारसी लस्सी का स्वाद चखाकर की सराहना

वाराणसी, 04 जुलाई (हि.स.)। बॉलीवुड अभिनेत्री भाग्यश्री इन दिनों काशी प्रवास पर हैं। शनिवार को उन्होंने लंका चौराहे पर स्थित पहलवान लस्सी की दुकान पर पहुंचकर बनारसी लस्सी का स्वाद चखा और काशी के पारंपरिक खानपान की खुलकर सराहना की।

फिल्म 'मैने प्यार किया' से लोकप्रिय हुई अभिनेत्री ने भाग्यश्री ने कहा कि बनारस की चाट और लस्सी उन्हें बेहद पसंद है। उन्होंने बताया कि जब भी काशी आने का अवसर मिलता है, वह यहां की चाट और लस्सी का स्वाद लेना नहीं भूलतीं। उनके अनुसार, काशी केवल धर्म, संस्कृति और संगीत की नगरी ही नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक और स्वादिष्ट व्यंजनों के कारण भी विश्वभर में विशिष्ट पहचान रखती है। भाग्यश्री के लस्सी की दुकान पर पहुंचते ही उन्हें देखने के लिए प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस दौरान उन्होंने वहां मौजूद लोगों से आत्मीयता से बातचीत की और लंका क्षेत्र के अन्य प्रसिद्ध खानपान केंद्रों की भी जानकारी ली। अभिनेत्री का लस्सी का आनंद लेते हुए बनाया गया वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।

इससे पूर्व शुक्रवार शाम भाग्यश्री ने श्री कालभैरव मंदिर में दर्शन-पूजन कर विधिवत आराधना की। मंदिर परिसर में उन्होंने कुछ समय बिताकर वहां के आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव किया। इसके बाद वह दशाश्वमेध घाट पहुंचीं, जहां उन्होंने मां गंगा का विधिवत पूजन किया और गंगा सेवा निधि द्वारा आयोजित विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती में सहभागिता की।

गंगा आरती के उपरांत गंगोत्री सेवा समिति ट्रस्ट की ओर से सचिव दिनेश शंकर दुबे ने पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न भेंट कर अभिनेत्री का स्वागत एवं सम्मान किया। इस अवसर पर उन्हें काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, मां गंगा की महिमा तथा विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी भी दी गई। भाग्यश्री ने मां गंगा के समक्ष देश और विश्व में सुख, शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना की।

उन्होंने कहा कि काशी का आध्यात्मिक वातावरण, गंगा तट की अलौकिक छटा और दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती का अनुभव उनके जीवन के सबसे अविस्मरणीय अनुभवों में शामिल रहेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी