मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मिली नई ताकत, जिलों में संभाले जा रहे हाई रिस्क केस
लखनऊ, 13 जुलाई (हि.स.)। योगी सरकार प्रदेश में मातृ मृत्यु दर कम करने व हर गर्भवती महिला को स्थानीय स्तर पर ही सुरक्षित प्रसव कराने के उद्देश्य से स्थानीय डॉक्टरों को हैंड आन ट्रेनिंग दे रही है, जिसका असर दिखने लगा है। अब डॉक्टर हाई रिस्क वाले मामलों को रेफर नहीं कर रहे, बल्कि स्थानीय स्तर पर ही उनका इलाज कर रहे हैं। अब तक केजीएमयू व एएमयू के अधीन आने वाले आठ जिलों के डॉक्टरों को प्रशिक्षण देकर उनके कौशल का क्षमतावर्धन किया जा चुका है। अन्य जिलों के चिकित्सकों को बारी-बारी से ट्रेनिंग दिए जाने की तैयारी है।
चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव डॉ. पिंकी जोवल ने बताया कि प्रदेश में जिलास्तर पर डॉक्टर तो थे, लेकिन उनमें उच्च जोखिम (गंभीर एनिमिया, हाई ब्लड प्रेशर, शॉक, एंटी पार्टम हैमरेज, पोस्ट पार्टम हैमरेज, लंबी प्रसव पीड़ा, बाधित प्रसव) वाले केसों को संभालने का आत्मविश्वास नहीं था और वे ऐसे केसों को रेफर कर दिया करते थे। अब तय किया गया है कि जच्चा-बच्चा का इलाज करने वाले जिलास्तरीय डॉक्टरों का क्षमता वर्धन किया जाए। पहले चरण में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों को आरआरटीसी सेंटर बनाया गया और उनके माध्यम से आसपास के जिलों के डॉक्टरों के कौशल का क्षमतावर्धन किया गया। दूसरे चरण में अब हाईब्रिड माध्यम से डॉक्टरों का क्षमतावर्धन व हैण्ड आन प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
उन्हाेंने बताया कि सीतापुर जिला महिला अस्पताल के प्रशिक्षण प्राप्त पांच डॉक्टर्स ने पिछले तीन महीने में 2,218 सुरक्षित प्रसव किये, जो प्रसव एक से एक हाई रिस्क वाले थे।
महिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. कमलेश कुमारी ने बताया कि हम सभी डॉक्टर हर तरह के हाईरिस्क प्रसव को संभाल रहे हैं और बहुत मजबूरी में ही मरीज को रेफर करते हैं।
डॉ. कमलेश ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद उनके अंदर भी मरीज की स्थिति देखकर जल्दी से फैसला लेने का आत्मविश्वास आया है और स्वयं कई गंभीर मरीजों को बचा पाईं। आज से पांच साल पहले जिला महिला अस्पताल में दिन भर में दो से तीन सीजेरियन प्रसव होते थे। अब औसतन 10 से 12 प्रसव रोजाना होते हैं।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डॉ. सुनीता कश्यप ने स्वीकारा कि ट्रेनिंग के बाद अस्पताल के डॉक्टरों में जच्चा-बच्चा को संभालने का विश्वास बढ़ा है। वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल, लखनऊ के चिकित्सा अधिकारी डॉ. देशबंधु गुप्ता ने बताया कि उनके अस्पताल में 10 डॉक्टरों ने यह ट्रेनिंग की है और इसका सीधा फायदा यह दिखता है कि अस्पताल में मातृ मृत्यु दर 80 से 90 प्रतिशत तक घटी है।
आरआरटीसी की मेंटर क्वीन मैरी अस्पताल की विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल ने कहा कि यह ट्रेनिंग सभी डॉक्टरों की होनी चाहिए। फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) से बहुत से मामले उनके अस्पताल आते हैं जिनका वहीं इलाज किया जा सकता है। बस डॉक्टरों में आत्मविश्वास आने की बात है। इसके बाद वे वहीं पर बहुत से जटिल केसों का इलाज कर लेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन