शारदीय नवरात्र: स्कंदमाता के दरबार में उमड़े श्रद्धालु, विद्यार्थियों ने मांगी बुद्धि और सफलता की कामना
—काशी में भोर से ही दर्शन-पूजन के लिए लगी कतारें, मां बागेश्वरी के दरबार में गूंजे जयकारे
वाराणसी, 15 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन गुरुवार को जैतपुरा स्थित बागेश्वरी देवी मंदिर परिसर में मां स्कंदमाता के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। बुद्धि, ज्ञान, वात्सल्य और प्रेम की प्रतीक मां स्कंदमाता के दरबार में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और युवाओं ने हाजिरी लगाई। श्रद्धालुओं ने मां के चरणों में शीश नवाकर बुद्धि, विद्या, यश और जीवन में सफलता का आशीर्वाद मांगा। मंदिर परिसर दिनभर मां के जयकारों से गूंजता रहा।
मां के दर्शन के लिए भोर से ही श्रद्धालुओं की कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। तड़के तीन बजे के बाद मां का भव्य श्रृंगार और मंगला आरती संपन्न हुई, जिसके बाद मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। मां की एक झलक पाने के लिए भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने चुनरी, नारियल और विभिन्न प्रकार के प्रसाद अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की।
विद्यार्थियों में दिखी विशेष आस्था
सनातन धर्म में मान्यता है कि मां स्कंदमाता की आराधना से बुद्धि, विवेक और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि उनके दरबार में बच्चों, विद्यार्थियों और युवाओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां की कृपा से पढ़ाई में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। संतान सुख की कामना करने वाले भक्त भी मां के दर्शन-पूजन को शुभ मानते हैं।
मंदिर में दर्शन करने पहुंचीं नाटी इमली और रामकटोरा क्षेत्र की पूजा उपाध्याय, शांति उपाध्याय और उषा केशरवानी ने बताया कि मां बागेश्वरी और मां स्कंदमाता को मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने कहा कि पढ़ाई में कठिनाइयों का सामना कर रहे विद्यार्थियों को मां की आराधना करनी चाहिए। मां अपने भक्तों को सद्बुद्धि, विद्या और विवेक प्रदान करती हैं। उनकी कृपा से बच्चों को पढ़ाई में आगे बढ़ने और जीवन में सफलता हासिल करने की प्रेरणा मिलती है।
भगवान स्कंद की माता होने से पड़ा स्कंदमाता नाम
मंदिर के महंत गोपाल मिश्र ने बताया कि मां दुर्गा का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। भगवान स्कंद यानी कार्तिकेय की माता होने के कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ। कमल के पुष्प पर विराजमान होने के कारण मां को पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उन्हें विद्यावाहिनी दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है। सिंह उनका वाहन है और वे सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।
महंत के अनुसार, मां स्कंदमाता की उपासना से साधक को तेज, ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। उनकी आराधना से वात्सल्य, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां अपने भक्तों के लिए मोक्ष के द्वार भी खोलती हैं। मां स्कंदमाता के साथ भगवान कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है।
मां की चार भुजाएं हैं। वे अपनी दाहिनी ओर की ऊपरी भुजा में भगवान स्कंद को गोद में धारण करती हैं। बाईं ओर की ऊपरी भुजा वरमुद्रा में रहती है, जबकि नीचे की एक भुजा में कमल का पुष्प सुशोभित है। मां का यह स्वरूप ममता, करुणा और ज्ञान का संदेश देता है।
काशी के अन्य देवी मंदिरों में भी उमड़ी भीड़
नवरात्र के पांचवें दिन काशी के अन्य प्रमुख देवी मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। दुर्गाकुंड स्थित मां कूष्मांडा मंदिर, मां संकठा मंदिर के समीप आत्माविश्वेश्वर मंदिर परिसर स्थित मां कात्यायनी मंदिर, कालिका गली स्थित काली मंदिर, मां अन्नपूर्णा मंदिर, गोलघर मैदागिन स्थित सिद्धिमाता मंदिर, लक्सा स्थित महालक्ष्मी मंदिर, भदैनी स्थित मां महिषासुर मर्दिनी मंदिर, लहुराबीर स्थित गायत्री माता मंदिर और शीतलाघाट स्थित शीतला देवी मंदिर में भक्तों ने दर्शन-पूजन किया। त्रिदेव मंदिर में भी दिनभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहा।
मां स्कंदमाता के दरबार में सुबह मंगला आरती के बाद शुरू हुआ दर्शन-पूजन का सिलसिला देर रात तक जारी रहा। श्रद्धालुओं की आस्था, भक्ति और मां के जयकारों से मंदिर परिसर पूरे दिन भक्तिमय बना रहा।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी