हमें ग्रंथों को समझने और उनकी गलत व्याख्याओं से बचने की आवश्यकता : नरेन्द्रानंद सरस्वती
संस्कृति संसद में संतों ने सनातन संस्कृति के संरक्षण और सामाजिक एकजुटता पर दिया जोर गुरुकुलों को सरकारी अनुदान देने की उठी मांग
वाराणसी, 04 नवंबर (हि.स.)। काशी सुमेरुपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारतीय धर्मग्रंथों को समझने के लिए उनके मूल स्वरूप और संदर्भों का अध्ययन जरूरी है। ग्रंथों की गलत व्याख्या से बचना होगा, क्योंकि एक शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं। पश्चिमी दबाव अथवा किसी षड्यंत्र के प्रभाव में आकर मूल ग्रंथों में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सनातन गुरुकुलों को सरकारी अनुदान देने और मठ-मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर उनका प्रबंधन समाज के हाथों में सौंपने की मांग की।
शंकराचार्य बुधवार को सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा की ओर से आयोजित संस्कृति संसद के दूसरे दिन के सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संस्कृति को जीवित रखने के लिए उसका अध्ययन और मूल परंपराओं का ज्ञान आवश्यक है। नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, धर्म और शास्त्रों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे।
सत्र में स्वामी प्रबोधानंद महाराज ने कहा कि भारत ने इतिहास में लंबे समय तक बाहरी आक्रमणों का सामना किया है। वहीं, अखिल भारतीय संत समिति के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष जगद्गुरु दिलीपदेवाचार्य ने समाज में संतों की घटती संख्या पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पश्चिमीकरण के बढ़ते प्रभाव से भारतीय समाज की पारंपरिक संस्कृति और जीवन मूल्यों में तेजी से बदलाव आ रहा है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत राजेंद्र दास ने कहा कि भारत का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। देश और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को एकजुट होकर काम करना होगा। साहित्यकार सर्वेश तिवारी ने कहा कि पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास हिंदू समाज के संघर्षों और चुनौतियों का साक्षी रहा है। आक्रांताओं ने भले ही मंदिरों को ध्वस्त किया हो, लेकिन लोगों के हृदय में स्थापित आस्था को समाप्त नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा कि सभ्यता और संस्कृति का संघर्ष केवल सत्ता के स्तर पर नहीं लड़ा जा सकता, इसकी शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर और समाज से करनी होगी।
अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने हिंदू धर्मग्रंथों और भारत की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण तथा पुनर्प्राप्ति पर जोर दिया। उन्होंने विलियम जोन्स का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय शास्त्रों और उनकी व्याख्याओं में बदलाव किए गए। धर्मग्रंथों में मिलावट की गई और फर्जी शास्त्र भी प्रस्तुत किए गए। उन्होंने मूल ग्रंथों के प्रामाणिक अध्ययन और ऐतिहासिक तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता बताई।
श्रीकाशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने कहा कि हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं को लेकर समाज में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाए गए हैं। इन्हें दूर करने के लिए शास्त्रों का सही ज्ञान और विद्वानों का मार्गदर्शन जरूरी है। प्रो. रविंद्र कुमार पाठक ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का किसी विषय का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है, लेकिन उसमें सवाल पूछने और विषय को समझने की जिज्ञासा होनी चाहिए।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामकमलाचार्य ने कहा कि शास्त्रों में सुधार और उनकी व्याख्या करना विद्वानों का कार्य है। राष्ट्रीय एवं सनातन हित में जो उचित है, उसी को महत्व दिया जाना चाहिए। वेद-पुराण प्रामाणिक हैं, इसलिए मनगढ़ंत वक्तव्यों और भ्रामक व्याख्याओं से बचना जरूरी है।
संस्कृति संसद को श्रीकाशी विद्वत परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय, निर्वाण पीठाधीश्वर विशोकानंद भारती और सुनील देवधर सहित अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया। समापन सत्र में प्रो. नागेंद्र पांडेय, जगद्गुरु मौली सरकार, जनार्दन हरि, महामंडलेश्वर मनमोहन दास, राधे-रोध बाबा, जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य, गोविंद शर्मा और अशोक तिवारी आदि मंच पर उपस्थित रहे।
अन्य सत्रों में राज्यसभा सांसद विद्यासागर सोनकर, श्रीकाशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष नागेंद्र पांडेय तथा विधायक एवं आयोजन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष कैलाशाचार्य की भी सहभागिता रही। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के साथ हुआ। समापन सत्र का संचालन स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने किया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी