शास्त्रों में संशोधन नहीं, प्रक्षेप और चोरी हुई पांडुलिपियों को सामने लाना हमारा उद्देश्य : स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती
—संस्कृति संसद में श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति गठित करने का प्रस्ताव, दो वर्षों में देश-विदेश में उपलब्ध भारतीय पांडुलिपियों की पहचान कर वापसी का होगा प्रयास
वाराणसी, 05 नवम्बर (हि.स.)। अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने गुरूवार को कहा कि हमारा उद्देश्य मनुस्मृति या अन्य धर्मशास्त्रों में संशोधन करना नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों में कथित प्रक्षेप, मिलावट और फर्जी ग्रंथों को सामने लाना तथा विदेशों में पहुंचाई गई भारत की बहुमूल्य पांडुलिपियों को वापस लाना है। शास्त्रों में संशोधन करना न हमारा अधिकार है और न ही हमारी औकात। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता और वरिष्ठ आचार्यों के संरक्षण में एक निष्पक्ष समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा।
स्वामी जितेंद्रानंद सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा की ओर से आयोजित संस्कृति संसद के तीसरे दिन के सत्र को संबोधित कर रहे थे। मनुस्मृति और भारतीय धर्मशास्त्रों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सभी ऋषियों ने अपने-अपने कालखंड में विचार व्यक्त किए हैं। 'कलौ पराशर स्मृति' की परंपरा को देखते हुए मनुस्मृति में संशोधन का प्रश्न ही नहीं उठता। हमारा सवाल यह है कि मनु और पितृसत्ता के नाम पर सनातन धर्म को कठघरे में खड़ा किया जाता है, जबकि भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति और देवी के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है। ऐसे विमर्शों का प्रमाणों के साथ उत्तर देना आवश्यक है।
उन्होंने भारतीय पांडुलिपियों के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1556 में गोवा के पणजी में बाइबिल के मुद्रण के लिए छापाखाना आया था। इससे पहले ऋषि-मुनि और विद्वान ताड़पत्रों पर ग्रंथों का लेखन करते थे। अंग्रेजी शासन के दौरान हिंदू लॉ बनाने के नाम पर भारतीय धर्मशास्त्रों और पांडुलिपियों का संग्रह किया गया। उन्होंने विलियम जोन्स का उल्लेख करते हुए बंगाल के ब्राह्मणों के साथ कथित अपमानजनक व्यवहार और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रदर्शित एक ऐसे चित्र का जिक्र किया, जिसमें भारतीय ब्राह्मण को जूते के नीचे बैठा दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि इन ऐतिहासिक घटनाओं और दस्तावेजों को भी समाज के सामने लाना चाहिए।
जितेन्द्रानंद ने दावा किया कि भारत की अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां लोहे के बक्सों में भरकर ब्रिटेन भेजी गईं। उन्होंने रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन तथा लॉर्ड टिग्नामेंट बाउंस से संबंधित एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें पांडुलिपियां ले जाने वाले व्यक्ति के जीवित लौटने पर उन्हें वापस करने और मृत्यु होने की स्थिति में उनके इच्छानुसार उपयोग की बात लिखी गई थी। उन्होंने कहा कि यह पत्र उनके पास उपलब्ध है और ऐसे साक्ष्यों की ऐतिहासिक जांच कर उन्हें सार्वजनिक करना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि भारत की पांडुलिपियां चीन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और ब्रिटेन सहित कई देशों में उपलब्ध हैं। कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी और रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में भी महत्वपूर्ण पांडुलिपियां मौजूद हैं। प्रस्तावित समिति अगले दो वर्षों में विभिन्न देशों में उपलब्ध भारतीय बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संपदा की पहचान करेगी और उन्हें भारत वापस लाने का प्रयास करेगी। इस अभियान में आवश्यकता पड़ने पर भारत सरकार के पांडुलिपि मिशन तथा विदेश यात्राएं करने वाले संतों और आचार्यों का सहयोग भी लिया जाएगा।
स्वामी जितेंद्रानंद ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास के जन्मस्थान और सूरदास के जन्मकाल जैसे विषयों पर भी विवाद खड़े किए गए हैं। उनके अनुसार, वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने सनातन परंपरा के विभिन्न पक्षों को विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने सनातन परंपरा के विरुद्ध उठाए जा रहे सवालों और कुछ कथित धर्माचार्यों के आचरण पर भी चिंता जताई। कहा कि यदि धर्माचार्य ही विदेशी मिशनरियों के सामने झुकते दिखाई देंगे तो हिंदू समाज का विश्वास कैसे कायम रहेगा।
उन्होंने कहा कि धर्मशास्त्रों में कथित मिलावट और प्रक्षेपों की आड़ में ब्राह्मणों को निशाना बनाया जा रहा है। फर्जी ग्रंथों को मूल शास्त्रों के रूप में प्रस्तुत करने और मूल पांडुलिपियों की चोरी के मामलों का प्रमाणों के साथ पर्दाफाश करना समय और धर्म की मांग है। इसके लिए संत समाज, विद्वानों और आचार्यों को पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर एकजुट होना होगा। अंत में उन्होंने संतों एवं प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी से भी इस विषय पर अपने विचार रखने का आग्रह किया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी