महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य का जीवंत मंचन देख लोगों को हुआ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एहसास

 




वाराणसी, 04 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में शुक्रवार देर शाम बीएलडब्ल्यू मैदान पर आयोजित तीन दिवसीय महानाट्य “सम्राट विक्रमादित्य” के भव्य मंचन ने दर्शकों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया। सजीव प्रस्तुति ने ऐसा वातावरण निर्मित किया, मानो पढ़े हुए इतिहास को अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देख रहे हैं। विशाल मंच पर हाथी-घोड़ों की टापों की गूंज के बीच सम्राट विक्रमादित्य के स्वर्णिम युग का जीवंत चित्रण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया। महानाट्य में 18 घोड़े, 2 रथ, 4 ऊंट, 1 पालकी और 1 हाथी के साथ कुल 225 से अधिक कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय प्रस्तुत कर खूब तालियां बटोरीं।

इस अवसर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के ऐसे महान शासक थे, जिनकी कीर्ति आज भी जनमानस में जीवित है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारें पर्यटन एवं संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त रूप से कार्य कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि इस महानाट्य का आयोजन महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के माध्यम से किया गया है, जिसकी परिकल्पना स्वयं डॉ. मोहन यादव ने की है।

पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित द्वारा रचित, राजेश कुशवाहा निर्मित तथा संजीव मालवी के निर्देशन में प्रस्तुत यह महानाट्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने वाला अनुभव सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महानाट्य की सराहना करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित यह प्रस्तुति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन उज्जैन की महाकाल की धरा और काशी को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

मुख्यमंत्री योगी ने सम्राट विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित इस नाट्य प्रस्तुति को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं से जोड़ने का एक सशक्त प्रयास बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत महाकाल की भस्म आरती एवं पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।

मंच पर जैसे ही दोनों मुख्यमंत्रियों ने दीप जलाकर आयोजन का शुभारंभ किया, पूरा परिसर तालियों और जयघोष से गूंज उठा। “भारत माता की जय” और “सम्राट विक्रमादित्य अमर रहें” के नारों ने वातावरण को उत्साह और गौरव से भर दिया। कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसका अद्वितीय मंचन रहा।

आयोजन स्थल पर एक साथ तीन विशाल मंच तैयार किए गए, जिन पर समांतर रूप से विभिन्न दृश्य प्रस्तुत किए गए। यह दृश्यांकन इतना सजीव था कि दर्शकों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे किसी महानाट्य का नहीं, बल्कि वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हों। इन तीन मंचों के माध्यम से सम्राट विक्रमादित्य के जीवन के बाल्यकाल, वीरता और युद्ध कौशल, न्यायप्रियता, प्रजा के प्रति करुणा और समर्पण तथा विद्वानों और कला के प्रति सम्मान आदि विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया। हर मंच पर दृश्य परिवर्तन, प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि प्रभाव इतने सटीक थे कि दर्शकों की नजरें एक पल के लिए भी मंच से नहीं हटीं।

कलाकारों ने अपने अभिनय, संवाद अदायगी और शारीरिक अभिव्यक्ति से सम्राट विक्रमादित्य के चरित्र को जीवंत कर दिया। कई दर्शकों ने कहा कि उन्होंने ऐसा भव्य और जीवंत मंचन पहले कभी नहीं देखा। विशेष रूप से बच्चों के लिए यह कार्यक्रम एक “लाइव इतिहास की किताब” जैसा था। इस ऐतिहासिक नाट्य प्रस्तुति में हाई-टेक लाइटिंग, डिजिटल साउंड इफेक्ट्स, एलईडी बैकड्रॉप व स्मोक और स्पेशल इफेक्ट्स आदि आधुनिक तकनीक का इस महानाट्य में भरपूर उपयोग किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी