श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा से काशी विश्वनाथ धाम के लिए रवाना हुई गुलाल-यात्रा
—बाबा विश्वनाथ के गौना उत्सव में अर्पित होगा नील-गुलाल, प्रसाद, फल एवं मेवा
वाराणसी, 26 फरवरी (हि.स.)। श्री काशी विश्वनाथ के गौना उत्सव (रंगभरी एकादशी) में शामिल होने के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा से गुलाल-यात्रा गुरूवार अपरान्ह वाराणसी के लिए समारोह के बीच रवाना की गई। श्रीकृष्ण जन्मभूमि से नील-गुलाल, प्रसाद, फल एवं मेवा आदि सामग्री लेकर गुलाल यात्रा देर रात श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुंचेगी। गुरूवार को यह जानकारी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने दी।
बताया गया कि गुलाल-यात्रा के पूर्व होली के भाव के अनुरूप ग्वाल-गोपी होली के रसिया पर नृत्य करते रहे। साथ ही जन्मस्थान पर संत जन भी ढोल, मृदंग, झांझ, मजीरे की मंगल ध्वनि पर उद्दाम संकीर्तन एवं नृत्य कर रहे थे। होली के परंपरागत वाद्ययंत्रों पर झूमते, नाचते एवं होली गायन करते हुऐ हजारों श्रद्धालु एवं ब्रजवासी रवानगी के समय मौजूद रहे। श्री कृष्ण-जन्मस्थान सेवा-संस्थान के सचिव कपिल शर्मा, प्रबंध समिति के सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने काशी विश्वनाथ धाम के लिए गुलाल-यात्रा को पुष्प वर्षा एवं नमन कर रवाना किया। ब्रज के लोक कलाकार राजेश शर्मा एवं ग्रुप, गोवर्धन, मथुरा के गुलाल यात्रा में ब्रज होली के भाव को साकार किया। इस यात्रा में संस्थान के आचार्य राम अवतार अवस्थी, राजीव गुप्ता,राकेश शर्मा एवं मौसम अग्रवाल शामिल है।
कपिल शर्मा ने बताया कि रंगभरी एकादशी के पावन अवसर पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं काशी विश्वनाथ धाम में होली का मुख्य आयोजन होता है। विगत वर्ष से स्थापित अलौकिक परंपरा जिसमें काशी विश्वनाथ धाम और श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मध्य होली के अवसर पर फाग भेजने की परंपरा शुरू हुई है।
गौरतलब हो कि भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी की प्रिय होली लीला में भगवान शिव का विशिष्ट स्थान है। भगवान शिव के हृदय में बसन्त भाव उत्पन्न हुआ वह भी होली खेलने के लिए ब्रज में पधारे। भगवान शिव के विचित्र रूप को देखकर गोपियां आश्चर्यचकित होते हुए कहने लगी मै केसे होरी खेलूं या बावरिया के संग, अंग भभूत, गले विषमाला, लटकन बिराजै गंग, मैं कैसे होरी खेलूं या बावरिया के संग। इसके उपरान्त भगवान कृष्ण के संकेत को पाकर भगवान शिव ने गोपी रूप धारण किया और प्रिया-प्रियतम की इस प्रिय लीला में सम्मिलित हुए, आज भी रंगेश्वर महादेव के रूप में रंगीली गली में विराजमान हैं। जिस ब्रज भाव और होली के आनन्द को प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने गोपी रूप धारण किया, आज उसी होली लीला की प्रसादी को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि से काशी विश्वनाथ धाम भेजा गया है। चूँकि काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर होली का मुख्य आयोजन रंगभरी एकादशी के दिन होता है। अतः काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि के प्रमुख होली उत्सव में परस्पर आदान-प्रदान से प्राप्त दिव्य प्रसाद का उपयोग होगा।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी