विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में भगवान गणेश का पूजन, रामलीला 25 सितंबर से
—रामलीला में प्रयोग होने वाले विभिन्न यंत्रों और मुखौटों आदि का पूजन
वाराणसी, 02 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में वाराणसी रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला की तैयारियों का औपचारिक शुभारंभ रविवार को प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के विधि-विधान से पूजन के साथ हुआ। रामनगर चौक स्थित 'रामलीला पक्की' परिसर में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही रामलीला में प्रयोग होने वाले विभिन्न यंत्रों, मुखौटों तथा मुख्य स्वरूपों के प्रशिक्षण का भी शुभारंभ किया गया।
शाम पांच बजे से आयोजित गणेश पूजन में काशी नरेश (रामनगर किला) के वंशज डॉ. अनंत नारायण सिंह के प्रतिनिधि एवं रामलीला ट्रस्ट के मंत्री डॉ. जय प्रकाश पाठक की उपस्थिति में वैदिक रीति से पूजा संपन्न हुई। डॉ. पाठक स्वयं पूजा में शामिल हुए।
अनुष्ठान के दौरान सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश एवं भगवान हनुमान के मुखौटों का शास्त्रोक्त विधि से पूजन-अर्चन किया गया। इसके बाद आचार्यों और ब्राह्मणों ने रामलीला के संवादों का पारंपरिक पाठ किया, जिसे मुख्य स्वरूपों ने दोहराया। कार्यक्रम के अंत में स्वरूपों का तिलक कर माल्यार्पण किया गया, उन्हें दक्षिणा प्रदान की गई तथा आरती के पश्चात प्रसाद वितरित किया गया।
बताते चले इस वर्ष द्वितीय गणेश पूजन 14 सितंबर को होगा, जबकि विश्वप्रसिद्ध रामनगर रामलीला का शुभारंभ 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर होगा। लगभग एक माह तक चलने वाली इस ऐतिहासिक रामलीला का समापन भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के भव्य आयोजन के साथ होगा।
करीब दो शताब्दियों से अधिक पुरानी यह रामलीला काशी नरेश के संरक्षण में आयोजित होती है और अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसकी सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने इसे अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया है।
रामनगर रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका मंचन किसी एक मंच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रामनगर के लगभग 5 से 10 किलोमीटर के क्षेत्र में निर्मित अयोध्या, जनकपुरी, चित्रकूट, पंचवटी, लंका सहित करीब 40 खुले स्थलों पर विभिन्न प्रसंगों के अनुरूप किया जाता है। आधुनिक तकनीक से दूर इस रामलीला में आज भी माइक और अत्याधुनिक प्रकाश व्यवस्था का प्रयोग नहीं होता। मशालों और पेट्रोमैक्स की रोशनी में कलाकार ऊंचे स्वर में संवाद बोलकर रामकथा के प्रसंगों को जीवंत करते हैं, जो इसकी पारंपरिक पहचान और सबसे बड़ा आकर्षण है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी