वाराणसी : रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में 23वें दिन भगवान राम और कुंभकरण से युद्ध

 


——कुंभकरण ने रावण को समझाया—राम नर नहीं, नारायण हैं,मेघनाद के वध के बाद मंदोदरी ने किया विलाप

वाराणसी, 17 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के रामनगर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध रामलीला के 23वें दिन शनिवार को भगवान श्रीराम और कुंभकरण के बीच भीषण युद्ध का मंचन हुआ। इसके साथ ही मेघनाद वध, नागपाश से श्रीराम की मुक्ति और मेघनाद के यज्ञ भंग करने जैसे प्रसंगों का सजीव मंचन किया गया। रामलीला देखने के लिए शाम को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कुंभकरण को नींद से जगाने का प्रसंग बच्चों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।

रामलीला के प्रसंग में लक्ष्मण की मूर्छा समाप्त होने की सूचना मिलने पर रावण चिंतित हो उठता है। अपनी सेना की लगातार पराजय से व्याकुल रावण अपने महाबली भाई कुंभकरण को जगाने के लिए अनेक उपाय करता है। नींद से जागने के बाद रावण उसे युद्ध की परिस्थितियों से अवगत कराता है। इस पर कुंभकरण उसे समझाते हुए कहता है कि उसने जगदंबा का हरण कर बड़ी भूल की है। श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात नारायण हैं।

हालांकि, रावण के भ्रातृधर्म का हवाला देने और तामसी भोजन कराने के बाद कुंभकरण युद्धभूमि में जाने के लिए तैयार हो जाता है। रणभूमि में पहुंचकर वह अपने भाई विभीषण से मिलता है और कहता है कि अब लंका में वही जीवित बचेंगे। वह स्वयं को काल के वश में बताते हुए कहता है कि उसे अब सही-गलत और अपने-पराए का भान नहीं रह गया है।

विभीषण भगवान श्रीराम को कुंभकरण के युद्धभूमि में पहुंचने की सूचना देते हैं। इसके बाद कुंभकरण और वानर सेना के बीच भीषण युद्ध होता है। हनुमान सहित अनेक वानर योद्धा उसका सामना करने में कठिनाई महसूस करते हैं। अंततः भगवान श्रीराम स्वयं रणभूमि में उतरते हैं और कुंभकरण का वध कर देते हैं। कुंभकरण की वीरता की सभी प्रशंसा करते हैं। इसके बाद नारद जी भगवान श्रीराम की वंदना करते हैं।

भाई कुंभकरण के मारे जाने से रावण व्याकुल हो उठता है। इसी बीच मेघनाद युद्ध की अनुमति लेकर रणभूमि में पहुंचता है। भीषण युद्ध के दौरान वह श्रीराम को नागपाश में बांध देता है। नारद जी के निवेदन पर गरुड़ आकर भगवान श्रीराम को नागपाश से मुक्त कराते हैं। इसके बाद श्रीराम के बाणों से मेघनाद मूर्छित हो जाता है।

मूर्छा टूटने के बाद मेघनाद यज्ञ करने जाता है। इसकी जानकारी मिलने पर विभीषण भगवान श्रीराम को बताते हैं कि यदि मेघनाद का यज्ञ पूरा हो गया तो उसे पराजित करना कठिन होगा। इस पर भगवान श्रीराम लक्ष्मण, अंगद और हनुमान को यज्ञ भंग करने तथा मेघनाद का वध करने के लिए भेजते हैं। लक्ष्मण रणभूमि में मेघनाद का वध करने का प्रण लेते हैं। वानर वीर यज्ञ को भंग कर देते हैं और लक्ष्मण मेघनाद का संहार करते हैं।

मेघनाद के वध के बाद हनुमान और अंगद सहित वानर वीर उसकी वीरता की प्रशंसा करते हैं तथा उसके पार्थिव शरीर को लंका के द्वार पर ले जाते हैं। पुत्र की मृत्यु से मंदोदरी विलाप करने लगती है। इस पर रावण इसे ब्रह्मा का प्रपंच बताता है। मेघनाद वध के बाद लक्ष्मण भगवान श्रीराम के पास लौटते हैं। इसी प्रसंग के साथ 23वें दिन की रामलीला का विश्राम होता है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी