रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में भगवान राम ने जयंत के एक नेत्र को किया भंग
माता अनसुईया ने सीता को बताया नारीधर्म, दिया चिर वस्त्र
वाराणसी, 09 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी वाराणसी के उपनगर रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में 15 वें दिन शुक्रवार शाम पंचवटी प्रसंग,इंद्र पुत्र जयंत के नेत्रभंग सहित अन्य प्रसंगों की रामलीला परम्परागत रूप से हुई। रामलीला चित्रकूट से आरंभ होती है, जहां भगवान राम,माता सीता का श्रृंगार स्वयं करते है। तभी वहां इंद्र का पुत्र जयंत कौआ का वेश बनाकर माता सीता को आहत करने की कोशिश करता है। यह देख भगवान राम एक बाण उसके पीछे छोड़ते है। यह देख जयंत त्रिलोक में भागता है,लेकिन उसकी रक्षा कोई नहीं करता । तभी देवर्षि नारद को उस पर दया आ जाती हैं । महर्षि जयंत से बोलते हैं, तुम राम जी के शरण में जाओं। राम जी उसका एक नेत्र भंग कर देते हैं और वो क्षमा मांगकर अपने लोक लौट जाता है। रामलीला प्रसंग में भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अत्रि मुनि के आश्रम जाते है।
मुनि भगवान राम का स्वागत कर बहुत विनय भक्ति से उनकी वंदना करते है। माता सीता को माता अनसुईया स्त्री धर्म सिखाती हैं। अत्रि मुनि को प्रणाम और आशीर्वाद प्राप्त कर प्रभु श्रीराम आगे बढ़ते हैं। श्रीराम भाई व पत्नी समेत मतंग ऋषि के आश्रम में रात्रि विश्राम कर प्रात: उनसे विदा लेते हैं। मार्ग में विराध राक्षस माता सीता को चुरा लेता है और राम-लक्ष्मण को खा जाने की धमकी देता है। श्रीराम सात बाणों से विराध का वध कर सीता को मुक्त कराते हैं। ब्रह्म लोक जाने की तैयारी मे रथारूढ़ शरभंग ऋषि भगवान राम को देखकर ठिठक जाते हैं और श्रीराम दर्शन से अपनी अभिलाषा पूर्ण बताते हैं। साथ ही चिता बनाकर वहीं बैठ जाते हैं, प्रभु श्रीराम द्वारा वर मांगने को कहने पर सीता-लक्ष्मण समेत अपने हृदय मे सदा सगुण रूप में बस जाने का आग्रह करते हैं और योगाग्नि में भस्म हो जाते हैं। पथ में दानवों द्वारा मारे गए ऋषियों के हड्डियो का ढ़ेर देखकर श्रीराम जी भुजा उठाकर प्रतिज्ञा करतें हैं कि जब तक इस भूमि से दुष्ट दानवों का वध नहीं कर लेता तब तक अयोध्या वापस नहीं जाऊंगा । इसके बाद भगवान सूतीक्ष्ण मुनि के पास जाते है।
मुनि रामलीला प्रसंग में कहते है कि मुझे घमंड हो तो इस बात का हो कि मैं भगवान का दास हूं तब भगवान उनको अपनी भक्ति प्रदान करते हैं। उनके साथ ही भगवान महान कुभंज (अगस्त्य) ऋषि( देवतो की रक्षा के लिए समुद्र को सोखने वाले, विंध्याचल पर्वत के अभिमान मर्दन करने वाले) के पास जाते है जहां से वो अस्त्र शस्त्र ज्ञान लेते हैं और ऋषि का आदर करते हुए उनको भी अपनी भक्ति प्रदान करते हैं । तत्पश्चात् भगवान राम का जटायु जी से मिलन होता है । तत्पश्चात गोदावरी तट के किनारे पंचवटी पर्णकुटी बनाकर निवास करते है और लक्ष्मण को ईश्वर और जीव के भेद समझाते हैं और कहते है मैं और मेरा,तुम और तेरा ही माया है। भगवन अपने मुख से लक्ष्मण जी को निमित्त बनाकर हम जैसे जीवों को भक्ति प्रेम प्राप्त करने का उपदेश देते है। यही आज की कथा का विश्राम हों जाता हैं और आज की आरती स्वयं लक्ष्मण जी करते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी