पितृपक्ष: प्रतिप्रदा श्राद्ध पर काशी में गंगा तट पर उमड़े श्रद्धालु,पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण किया
- अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर उमड़ी भीड़
वाराणसी,27 सितंबर(हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष की शुरुआत हो गई। रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध तिथि पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए बड़ी संख्या में लोग गंगा तट और अनादि विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध कर्म के लिए उमड़ पड़े। लोगों ने पूरे श्रद्धाभाव से त्रिपिंडी श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और विधि विधान से श्राद्ध कर्म किया। जिनके पूर्वजों की अकाल मृत्यु हुई थी उन्होंने श्रद्धापूर्वक कर्मकांडी ब्राम्हणों से त्रिपिंडी श्राद्ध कराया।
श्राद्धकर्म के लिए दूर-दराज के प्रांतों से श्रद्धालु शनिवार शाम को ही शहर में आ गये थे। रविवार अलसुबह से ही गंगा तट और पिशाचमोचन कुंड गुलजार हो गया। गया जाने के पूर्व पिशाचमोचन कुंड पर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा निवेदित करने के लिए लोग श्राद्ध कर्म सुबह से करते रहे। माना जाता है कि तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितृदोष से मुक्ति के साथ पितरों की आत्मा भी तृप्त होती है। तर्पण न करने से पितरों को मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा भी मृत्यु लोक में भटकती है। ऐसे में पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है।
विष्णुपुराण के अनुसार, श्रद्धापूर्वक श्राद्धकर्म करने से केवल पितृगण ही तृप्त नहीं होते, बल्कि ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी तृप्त होते हैं। मान्यता है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज भी सभी पितरों को अपने यहां से छोड़ देते हैं, ताकि वे अपनी संतान(वंशजों)से श्राद्ध के निमित्त भोजन ग्रहण कर लें। इस माह में श्राद्ध न करने वालों के पितर अतृप्त होकर उन्हें शाप देकर पितृ लोक लौट जाते है। ऐसे में पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके जीवन में सभी कार्य सिद्ध होते हैं और घर, परिवार, वंश बेल की वृद्धि होती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी जब सूर्य नारायण कन्या राशि में विचरण करते हैं तब पितृलोक पृथ्वी लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। श्राद्ध का अर्थ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से है। जो मनुष्य उनके प्रति उनकी तिथि पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल-फूल, अन्न, मिष्ठान आदि से ब्राह्मण को भोजन कराते हैं। इससे प्रसन्न होकर पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देकर जाते हैं।
श्राद्ध पक्ष में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र, पौत्रादि हमें पिंडदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म में प्रत्येक गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी