वाराणसी: पुरुषोत्तम मास के परमा एकादशी पर हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में लगाई पुण्य की डुबकी

 


- दान पुण्य के बाद डेढ़सी के पुल दशाश्वमेध स्थित देवगुरू बृहस्पति और बाबा विश्वनाथ के दरबार में लगाई हाजिरी

वाराणसी, 11 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में पुरुषोत्तम मास (ज्येष्ठ अधिक मास) की परमा एकादशी के अवसर पर गुरुवार को आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। भोर से ही हजारों श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में स्नान के लिए विभिन्न घाटों पर पहुंचने लगे। गंगा स्नान के दौरान हर-हर गंगे और हर-हर महादेव के जयघोष से घाटों का वातावरण भक्तिमय बना रहा।

परमा एकादशी पर श्रद्धालुओं ने दशाश्वमेध घाट सहित अहिल्याबाई घाट, शीतला घाट, मीर घाट, पंचगंगा घाट, गाय घाट, राजघाट, अस्सी घाट, केदार घाट और सामने घाट पर गंगा स्नान कर पुण्य अर्जित किया। स्नान-ध्यान एवं दान-पुण्य के पश्चात श्रद्धालुओं ने दशाश्वमेध स्थित डेढ़सी के पुल के समीप देवगुरु बृहस्पति मंदिर में दर्शन-पूजन किया तथा काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के दरबार में भी मत्था टेका।

परमा एकादशी के अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में दिनभर श्रद्धालुओं की चहल-पहल बनी रही।

वाराणसी के नक्खीघाट तपोवन निवासी कर्मकांडी पंडित रविन्द्र तिवारी ने बताया कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को परमा, पुरुषोत्तमी अथवा कमला एकादशी कहा जाता है। सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन अधिक मास आने पर इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास की दो प्रमुख एकादशियां पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के रूप में जानी जाती हैं।

उन्होंने बताया कि परमा एकादशी को कामदा एकादशी भी कहा जाता है। ‘परमा’ का अर्थ सर्वोत्तम अथवा श्रेष्ठ होता है। सनातन धर्मग्रंथों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव और भगवान शिव की कृपा से कुबेर को देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ था।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुरुषोत्तम मास की परमा एकादशी अत्यंत पुण्यदायी एवं दुर्लभ मानी जाती है। शास्त्रों में इसे पापों का नाश करने वाली तथा मोक्षदायिनी एकादशी कहा गया है। गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले लोगों सहित सभी वर्गों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना गया है।

--------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी