अब काशी के गंगा घाटों पर लगेगा 'अर्पण कलश' ,गंदगी रोकने की नगर निगम की पहल

 




—गंगा में पूजन सामग्री सीधे फेंकने के बजाय कलश में डालेंगे श्रद्धालु,अस्सी से हुई शुरूआत, जल्द ही दशाश्वमेध, राजघाट, पंचगंगा घाट, केदारघाट व सिंधिया घाट पर भी लगेगा अर्पण कलश

वाराणसी,23 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी (काशी ) में मोक्षदायिनी गंगा नदी के घाटों को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने के लिए नगर निगम ने बड़ी पहल की है। अब श्रद्धालुओं द्वारा घाटों पर छोड़े जाने वाले पुराने कपड़ों और पूजा सामग्री से घाट गंदे नहीं होंगे। इसके लिए निगम ने प्रमुख घाटों पर 'अर्पण कलश' स्थापित करने का निर्णय लिया है। निगम ने सोमवार को अस्सी घाट से इसकी शुरूआत भी कर दी है। अपर नगर आयुक्त सविता यादव ने बताया कि श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान करते हुए घाटों की स्वच्छता हमारी प्राथमिकता है। अर्पण कलश से न केवल गंदगी कम होगी, बल्कि गंगा की मर्यादा भी बनी रहेगी। वाराणसी नगर निगम ने प्रथम चरण में छह घाटों अर्पण कलश स्थापित कराने का निर्णय लिया है। इस क्रम में अस्सी घाट के बाद जल्द ही दशाश्वमेध, राजघाट, पंचगंगा घाट, केदारघाट और सिंधिया घाट पर भी अर्पण कलश रखे जाएंगे। इन घाटों पर सबसे अधिक भीड़ होती है और अक्सर स्नान के बाद श्रद्धालु अपने पुराने वस्त्र वहीं छोड़ देते हैं, जिससे घाटों की सुंदरता प्रभावित होती है। वहीं, गंगा स्नान के बाद कुछ लोग न केवल कपड़े बल्कि इस्तेमाल की गई माला, फूल और अन्य पूजन सामग्री भी घाट की सीढ़ियों पर छोड़ देते हैं। इसके कारण पूजन सामग्रियों पर श्रद्धालुओं के पैर भी पड़ जाते है । श्रद्धालु अब इन सामग्रियों को सीधे अर्पण कलश में डाल सकेंगे। उन्होंने कहा कि यदि कोई श्रद्धालु अनजाने में कपड़े घाट पर छोड़ देता है, तो वहां तैनात सफाईकर्मी मुस्तैदी के साथ उन कपड़ों को उठाकर सुरक्षित तरीके से कलश में डाल देंगे। काशी में श्री काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। प्रतिदिन लाखों की संख्या में भक्त बाबा के दर्शन और गंगा स्नान के लिए पहुंच रहे हैं। घाटों पर दबाव बढ़ने के कारण सफाई व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से निगम ने यह कदम उठाया गया है। नगर निगम प्रशासन का मानना है कि 'अर्पण कलश' के माध्यम से कचरा प्रबंधन और अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी