मणिकर्णिका घाट के चक्र पुष्करिणी कुंड में श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी,मां मणिकर्णिका की झांकी देख आह्लादित

 




मातारानी के अष्टधातु की प्रतिमा का फूलों और आभूषणों से हुआ विशेष श्रृंगार

वाराणसी,21 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में अक्षय तृतीया पर्व के दूसरे दिन मंगलवार को हजारों श्रद्धालुओं ने मणिकर्णिका घाट स्थित पवित्र चक्र पुष्करिणी कुंड में अक्षय पुण्य की कामना लिए आस्था की डुबकी लगाई। कुंड में स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने मां मणिकर्णिका की अष्टघातु की प्रतिमा का दर्शन पूजन किया। कुंड में स्नान को देखते हुए सुरक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया है। पुलिस अफसर फोर्स के साथ कुंड और आसपास लगातार गश्त करते रहे।

श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन और स्नान का अवसर मिल सके, इसके लिए विशेष बैरिकेडिंग और मार्ग व्यवस्थाएं भी की गई थीं। इसके पहले सोमवार की शाम मां मणिकर्णिका के प्रतिमा के पूजन के बाद पुजारी ने माता का विशेष स्नान-अनुष्ठान के बाद विधि-विधान से शृंगार किया। देर शाम कुंड पर मां मणिकर्णिका की झांकी सजाई गई थी। फूलों और आभूषणों से सजे स्वरूप का विशेष श्रृंगार किया गया।

मणिकर्णिका कुंड के प्रधान पुरोहित पं. जयेंद्रनाथ दुबे ने पत्रकारों को बताया कि इस कुंड में साल में एक ही बार अक्षय तृतीया के अगले दिन मां मणिकर्णिका की प्रतिमा को सुसज्जित कर कुंड के तट पर लाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन कुंड में स्नान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है, जीवन के दोष मिटते हैं और रोगों से मुक्ति मिलती है। पुरोहित परिवार के सदस्यों के बाद श्रद्धालुजनों ने पापों से मुक्ति व पुण्य फल कामना से कुंड में डुबकी लगाई। दर्शन-पूजन किया और माता को मौसमी फल अर्पित किए।

बताते चलें कि काशी में मान्यता है कि मां मणिकर्णिका की अष्टधातु की प्रतिमा प्राचीन समय में इसी कुंड से निकली थी। लगभग ढाई फीट ऊंची यह प्रतिमा वर्षभर ब्रह्मनाल स्थित मंदिर में विराजमान रहती है। सिर्फ अक्षय तृतीया को सवारी निकालकर पूजन-दर्शन के लिए प्रतिमा कुंड स्थित 10 फीट ऊंचे पीतल के आसन पर विराजमान कराई जाती है। काशी में माना जाता है कि मणिकर्णी माई के स्नान से तीर्थ कुंड का जल अगले एक वर्ष के लिए फिर सिद्ध हो जाता है और इसी जल में स्नान करने से श्रद्धालुओं के पाप-कष्ट दूर होते हैं। काशी खंड के अनुसार गंगा अवतरण के पहले से इस कुंड का अस्तित्व है।

भगवान विष्णु ने देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने के लिए यहां हजारों वर्ष तपस्या की थी। भोलेनाथ और देवी पार्वती के स्नान के लिए उन्होंने कुंड को अपने सुदर्शन चक्र से स्थापित किया था। स्नान के दौरान मां पार्वती का कर्ण कुंडल कुंड में गिरने से नाम मणिकर्णिका पड़ा। यहां पर अक्षय तृतीय पर स्नान का अधिक महत्व है। इस कुंड में स्नान से अक्षय फल, चारों धाम के पुण्य का लाभ मिलता है। इसलिए कुंड में स्नान के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी