मणिकर्णिका घाट पर मां मणिकर्णिका का विधि विधान से वार्षिक शृंगार, पारंपरिक वस्त्र, स्वर्ण-रजत आभूषण अर्पित

 


—मंगलवार को श्रद्धालु खड़ी दोपहरी में मणिकर्णिका कुंड में स्नान कर करेंगे दर्शन पूजन

वाराणसी, 20 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित मोक्ष तीर्थ मणिकर्णिका घाट पर मां मणिकर्णिका का सोमवार को वार्षिक शृंगार विधि-विधान से किया गया। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया अक्षय तृतीया पर मंदिर के प्रधान पुरोहित जयेंद्रनाथ दुबे ने प्राचीन तीर्थ चक्रपुष्करणी (मणिकर्णिका कुंड) में अष्टधातु वाली ढाई फीट ऊंची प्रतिमा का विधि विधान से श्रृंगार कर पूजन किया। सांयकाल मां मणिकर्णिका की प्रतिमा को विशेष अनुष्ठान के साथ कुंड में लाया गया। इसके बाद परम्परानुसार माता के विग्रह को पारंपरिक वस्त्र, स्वर्ण-रजत आभूषण एवं पुष्पमाला धारण कराया गया। रात्रि में भव्य आरती उतारी गई।

मंगलवार को कुंड में स्नान के बाद मां मणिकर्णिका का दर्शन-पूजन करेंगे।

गौरतलब हो कि मणिकर्णिका घाट स्थित अनादि तीर्थ पुष्करणी चक्र मणिकर्णिका कुंड में स्नान से पुण्य की प्राप्ति होती है। कुंड का जल त्रिविध पाप ताप से मुक्त करता है। लोगों में विश्वास है कि कुंड के जल को हर साल 'सिद्ध' करने खुद मणिकर्णी माई यहां स्नान करती हैं।

अक्षय तृतीया पर सोमवार को मणिकर्णी माई की सवारी ब्रहमनाल स्थित नौकुल सरदार व तीर्थ पुरोहित जयेंद्रनाथ दुबे बब्बू महाराज के आवास से निकली। रात में मणिकर्णी माई की अष्टधातु वाली ढाई फीट ऊंची प्रतिमा तीर्थ कुंड में स्थित 10 फीट ऊंचे पीतल के आसन पर स्थापित की गई। यहां देवी की फूलों व नए वस्त्रों से झांकी सजाई गई। मान्यता है कि मणिकर्णी माई की अष्टधातु की प्रतिमा प्राचीन समय में इसी कुंड से निकली थी। यह प्रतिमा वर्षभर ब्रहमनाल स्थित मंदिर में विराजमान रहती है। सिर्फ अक्षय तृतीया को सवारी निकालकर पूजन-दर्शन के लिए कुंड में स्थापित किया जाता है ।

——गंगा नदी से भी पुराना है कुंड

धर्म नगरी काशी में मान्यता है कि देवों के देव महादेव ने काशी बसाने के बाद भगवान विष्णु को इस सृष्टि के पालन के लिए आह्वान किया। यहां हरि का चक्र गिरने से कुंड का आकार बना जिसे चक्रपुष्करणी कहा गया। यहां 11 वर्षो तक भगवान ने तपस्या की, उनके पसीने से कुंड भर गया। भगवान शिव, देवी पार्वती संग यहां पहुंचे तो खुशी से झूम उठे। माता पार्वती का कान के कुंडल की मणि कुंड में गिर गई। इसके बाद से ही इसे चक्रपुष्करणी मणिकर्णिका कुंड कहा जाने लगा।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी