संतान की दीर्घायु के लिए माताओं ने रखा ललही छठ व्रत, तालाब-कुंडों पर उमड़ी भीड़

 




—समूह में एकत्रित होकर महिलाओं ने की हलषष्ठी माता व भगवान बलराम की पूजा, सुनी कथा

वाराणसी, 02 सितंबर (हि.स.)। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर बुधवार को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में ललही छठ का पर्व आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया गया। संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए महिलाओं ने निर्जला व्रत रखा। शहर के ईश्वरगंगी तालाब, लक्ष्मीकुंड, लोलार्क कुंड समेत नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के तालाबों, पोखरों व कुओं के किनारे व्रती महिलाओं की भीड़ जुटी। महिलाओं ने समूह में पूजा-अर्चना कर हलषष्ठी माता और भगवान बलराम की कथा सुनी।

सुबह से ही व्रती महिलाओं ने घरों में पूजा की तैयारी शुरू कर दी थी। महिलाओं ने भैंस के गोबर से पूजा स्थल की दीवार पर हलछठ माता का चित्र बनाया और विधि-विधान से पूजन किया। इसके बाद भगवान गणेश और माता गौरी की भी पूजा की गई। पूजा में नारियल, मिष्ठान, फल-फूल, मेवा, महुआ, कमेर, तिल, गुम का पत्ता, तिन्नी का चावल और दही समेत विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित की गई।

कई स्थानों पर महिलाओं ने समूह में कुश को जमीन में स्थापित कर उसकी पूजा की। पूजा के बाद कुश और महुआ के पत्तों का पूजन कर उन पर महुआ, तिन्नी का चावल, गुड़ और दही का प्रसाद रखा गया। व्रती महिलाओं ने प्रसाद का वितरण कर अपनी संतानों के दीर्घ जीवन और सुख-समृद्धि की कामना की।

वाराणसी के ईश्वरगंगी मोहल्ले की ईश्वरी सिंह, गीता सिंह, अनुपमा तिवारी, ज्योत्सना चौबे और माया यादव ने बताया कि ललही छठ का व्रत पुत्र की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। परिवार में इस पर्व को परंपरागत तरीके से पूरे श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाता है। तालाब या कुंड के किनारे हलषष्ठी माता और भगवान बलराम की पूजा करने की परंपरा है।

बलराम के जन्म से जुड़ी है मान्यता

सनातन परंपरा में ललही छठ को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्म से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन माताएं व्रत रखकर हलषष्ठी माता की पूजा करती हैं और कथा सुनती हैं।

कथा के अनुसार, कंस को जब यह पता चला कि वासुदेव और देवकी की संतान उसके विनाश का कारण बनेगी तो उसने दोनों को कारागार में बंद कर दिया। कंस ने उनकी छह संतानों का वध कर दिया। सातवीं संतान के समय देवकी की रक्षा के लिए नारद मुनि ने उन्हें हलषष्ठी माता का व्रत करने की सलाह दी। देवकी के व्रत के प्रभाव से भगवान की योगमाया ने देवकी के गर्भ में पल रहे सातवें शिशु को रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। बाद में रोहिणी के गर्भ से बलराम का जन्म हुआ, जबकि देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। मान्यता है कि हलषष्ठी माता के व्रत के प्रभाव से दोनों पुत्रों की रक्षा हुई।

ग्वालिन की कथा भी सुनाई

ललही छठ से जुड़ी एक अन्य लोककथा में ग्वालिन का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार, एक ग्वालिन दूध-दही बेचकर जीवन यापन करती थी। एक बार गर्भवती होने के बावजूद वह दूध बेचने निकली। रास्ते में प्रसव पीड़ा होने पर उसने पेड़ के नीचे पुत्र को जन्म दिया और उसे वहीं सुलाकर दूध बेचने चली गई। उस दिन हरछठ का व्रत था और लोगों को भैंस का दूध चाहिए था। ग्वालिन ने गाय का दूध भैंस का दूध बताकर बेच दिया। इससे हलषष्ठी माता नाराज हो गईं और उसके पुत्र की मृत्यु हो गई। लौटकर ग्वालिन ने पुत्र को मृत पाया तो वह विलाप करने लगी। अपनी गलती का अहसास होने पर उसने सबके सामने अपनी भूल स्वीकार की और माता से क्षमा मांगी। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर हलषष्ठी माता ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया। इसी लोक मान्यता के चलते महिलाएं संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए ललही छठ का व्रत रखती हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी