वाराणसी: खंडग्रास चंद्रग्रहण के मोक्षकाल में हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में लगाई डुबकी,किया दानपुण्य
—घरों में खाद्य सामग्रियों की पवित्रता के लिए तुलती की पत्ती अथवा कुश डाला,मंदिरों में दर्शन पूजन के लिए उमड़ी भीड़
वाराणसी, 03 मार्च (हि.स.)। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथी पर मंगलवार को खंडग्रास चंद्रग्रहण के मोक्ष काल में हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में पुण्य की डुबकी लगाई और दानपुण्य किया। इसमें सैकड़ों ऐसे भी श्रद्धालु नर-नारी रहे जो ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष तीनों कालों में गंगास्नान किया। मोक्ष स्नान का सिलसिला शाम 06.50 बजे से शुरू हो गया। चंद्रग्रहण के पूर्व अपरान्ह तीन बजे ही हजारों श्रद्धालु नर नारी गंगा तट पर पहुंच गए।
ग्रहण के स्पर्श काल शाम 06 बजकर 04 मिनट से गंगा स्नान कर श्रद्धालु घाट पर मोक्षकाल तक भजन कीर्तन करते रहे। ग्रहण के मध्यकाल और मोक्ष के बाद फिर से गंगा स्नान कर दान पुण्य करते हुए श्रद्धालु घर लौटे। सैकड़ों श्रद्धालु ग्रहण का स्पर्श होने से पहले ही पवित्र गंगा नदी में कमर तक जल में खड़े होकर मोक्ष काल तक मंत्र का जप करते रहे। मोक्षकाल के बाद गंगा में डुबकी लगाकर ग्रहण का दान किया। इसके बाद घर लौटे। चंद्रग्रहण के चलते घाटों पर उमड़ी भारी भीड़ को देख घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद रही। एनडीआरएफ और जल पुलिस के जवानों के साथ अफसर मोटर बोट से गंगा में गश्त करते रहे। दशाश्वमेध घाट से लगायत चितरंजन पार्क तक श्रद्धालुओं की भीड़ आस्था की डुबकी लगाने के लिए जुटी रही।
चंद्रग्रहण का मोक्ष काल होते ही भक्तों ने हर-हर महादेव के जयघोष के साथ गंगा में डुबकी लगाई। गंगा स्नान के बाद भक्तों का रेला काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचा। चंद्रग्रहण पर दान लेने के लिए बड़ी संख्या में भिखारियों का जमावड़ा दशाश्वमेध, शीतलाघाट, राजेन्द्र प्रसाद, सिंधिया घाट, पंचगंगाघाट, अस्सीघाट पर रहा। चंद्रग्रहण के डेढ़ घंटे पूर्व श्री काशी विश्वनाथ मंदिर,अन्नपूर्णा मंदिर,कालभैरव मंदिर के पट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद हो गए। वहीं, संकट मोचन मंदिर, गौरी केदारेश्वर, दुर्गाकुंड स्थित दुर्गा मंदिर, दुर्ग विनायक मंदिर, त्रिदेव मंदिर, लोहटिया स्थित बड़ा गणेश, सोनारपुरा स्थित चिंतामणि गणेश, बीएचयू विश्वनाथ मंदिर सूतक काल में ही बंद हो गए। उधर, आस्थावानों ने घरों में भी ग्रहण काल के नियमों का पालन किया। सूतक काल से ही प्रभु आराधना में जुटे रहे। ग्रहण के सूतक काल में खाद्य सामग्रियों की पवित्रता के मद्देनजर उनमें तुलती की पत्ती अथवा कुश डाल दिये गए। सनातनियों ने अपने घरों में स्थित मंदिरों अथवा देवस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये थे। इसके बाद मोक्षकाल के बाद श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खुल गया। मंदिर खुलते ही श्रद्धालुओं का रेला हर-हर महादेव के कालजयी उद्घोष के बीच बाबा का दर्शन पूजन के लिए उमड़ पड़ा।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी