सुपर एल-नीनो 2026 की चुनौतियों से निपटने में डीएसआर बनेगी किसानों की बड़ी ताकत : डॉ. विकास कुमार सिंह

 


— बीएचयू की राष्ट्रीय कार्यशाला में जलवायु-अनुकूल खेती और वैकल्पिक फसल प्रणालियों पर जोर

वाराणसी, 11 जून (हि.स.)। संभावित सुपर एल-नीनो वर्ष 2026 के मद्देनज़र कृषि क्षेत्र के सामने उभरने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) तकनीक और वैकल्पिक फसल प्रणालियों को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है। यह बात ईरी-सार्क, वाराणसी के निदेशक एवं कार्यशाला के मुख्य अतिथि डॉ. विकास कुमार सिंह ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन अवसर पर कही।

उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु, जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और कृषि लागत में निरंतर वृद्धि के बीच डीएसआर तकनीक किसानों के लिए एक प्रभावी जलवायु-अनुकूल विकल्प बनकर उभर रही है। यह तकनीक न केवल जल संरक्षण में सहायक है, बल्कि श्रम एवं उत्पादन लागत को कम करने के साथ-साथ समय पर फसल स्थापना सुनिश्चित करती है। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और किसानों के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना केवल वैज्ञानिक नवाचारों को खेत स्तर तक पहुंचाकर ही किया जा सकता है।

कृषि विज्ञान संस्थान, बीएचयू द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला “सुपर एल-नीनो वर्ष 2026 में धान की सीधी बुवाई एवं वैकल्पिक फसलें” का गुरुवार को समापन हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य जल संकट, बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना था।

समापन समारोह में विशिष्ट अतिथि पूर्व निदेशक प्रसार शिक्षा, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी डॉ. एस. एस. सिंह ने कहा कि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण, लागत में कमी और समय पर फसल स्थापना के लिए किसान हितैषी विकल्प है। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, कृषि विभागों और किसान संगठनों के बीच बेहतर समन्वय तथा किसानों के प्रशिक्षण एवं क्षमता संवर्धन कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।

अध्यक्षीय संबोधन में कृषि विज्ञान संस्थान, बीएचयू के निदेशक प्रो. यू. पी. सिंह ने कहा कि संभावित सुपर एल-नीनो परिस्थितियां कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। ऐसे समय में डीएसआर तकनीक, वैकल्पिक फसल प्रणालियां और जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियां किसानों को जोखिम कम करने और उत्पादन बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।

कार्यशाला के दूसरे दिन आयोजित विभिन्न तकनीकी सत्रों में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने डीएसआर तकनीक, प्राकृतिक खेती, उन्नत धान किस्मों और जल प्रबंधन पर अपने विचार साझा किए। दोपहर में आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों, कृषि अधिकारियों और प्रगतिशील किसानों ने डीएसआर तकनीक के विस्तार, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, खरपतवार प्रबंधन, यंत्रीकरण तथा किसानों के प्रशिक्षण जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया। चर्चा का संयोजन डॉ. विकास कुमार सिंह ने किया। कार्यशाला की संक्षिप्त रिपोर्ट डॉ. निखिल कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि दो दिनों तक चले इस आयोजन में वैज्ञानिकों, कृषि अधिकारियों, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों और किसानों के बीच ज्ञान एवं अनुभवों का प्रभावी आदान-प्रदान हुआ, जिससे सुपर एल-नीनो वर्ष 2026 की चुनौतियों से निपटने के लिए व्यावहारिक रणनीतियां विकसित करने में सहायता मिलेगी। कार्यशाला में 700 से अधिक किसानों और 50 से अधिक कृषि विभाग अधिकारियों ने भाग लिया ।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी