अनुसंधान, नीति और व्यवहार का आधार प्रमाण-आधारित आँकड़े होने चाहिए : प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी
—जलवायु सहनशील कृषि और सतत विकास पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
वाराणसी,05 फरवरी (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि अनुसंधान, नीति और व्यवहार का आधार प्रमाण-आधारित आँकड़े होने चाहिए। उन्होंने संस्थानों एवं विषयों के बीच गहन सहयोग की वकालत करते हुए किसानों और व्यवहारिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए विश्वविद्यालय की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। समाज के प्रति अनुसंधान की जवाबदेही को रेखांकित करते हुए उन्होंने वैज्ञानिकों से अपेक्षा की कि वे यह सुनिश्चित करें कि प्रयोगशाला का कार्य समुदायों के लिए ठोस लाभ में कैसे परिवर्तित होगा।
कुलपति गुरूवार को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “सतत विकास के लिए जलवायु अनुकूल कृषि: नवाचार और समाधान के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संस्थान के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग द्वारा आयोजित सम्मेलन में अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने कृषि उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने भारतीय एवं वैश्विक कृषि के लिए सार्थक और परिवर्तनकारी परिणामों की उम्मीद जताई।
सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ( अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान हैदराबाद) ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव उन गरीब समुदायों पर पड़ रहा है, जिनका इसमें सबसे कम योगदान है। उन्होंने कहा कि यह खाद्य सुरक्षा, आजीविका और संसाधनों के लिए गंभीर खतरा है। जलवायु परिवर्तन को एक साझा चुनौती बताते हुए उन्होंने सामूहिक समाधान की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. पाठक ने कृषि संसाधन प्रबंधन के पाँच ‘आर’ — रेजिस्टेंस , रिकवरी , रिबाउंडिंग , रीजेनेरेशन और रॉबस्टनेस की अवधारणा स्पष्ट की तथा प्राकृतिक, आनुवंशिक और सामाजिक-आर्थिक संसाधनों के समेकित प्रबंधन को जलवायु अनुकूल कृषि प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक बताया।
सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि प्रो. पंजाब सिंह, कुलाधिपति, रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी, ने कृषि क्षेत्र के समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियों—उत्पादन वृद्धि एवं स्थायित्व, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, संसाधन उपयोग दक्षता, कृषि लाभप्रदता तथा जलवायु अनुकूलन पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्ष 2050 तक लगभग 1.7 अरब जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती को पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हुए पूरा करना होगा। पद्म भूषण डॉ. राम बदन सिंह,डॉ. सुधांशु सिंह, निदेशक, अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (ईरी) दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र ने भी विचार प्रकट किया। इसके अलावा
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कृषि क्षेत्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों तथा उनके समाधान पर अपने विचार साझा किए। इसके पहले प्रतिनिधियों का स्वागत प्रो. उदय प्रताप सिंह, निदेशक, कृषि विज्ञान संस्थान ने किया। सम्मेलन के संयोजक प्रो. श्रवण कुमार सिंह, विभागाध्यक्ष, आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन, ने जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, घटते प्राकृतिक संसाधन का जिक्र किया। उद्घाटन सत्र में सम्मेलन स्मारिका का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विजई पांडुरंगम, पादप शरीर क्रिया विज्ञान विभाग और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जे. जोर्बन, आयोजन सचिव ने दिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी