विशेषज्ञता आवश्यक, लेकिन अत्यधिक संकुचित विशेषज्ञता ज्ञान की समग्रता को भी कर सकती है सीमित : प्रो.सिद्धार्थ सिंह

 


—बीएचयू में “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएं” विषय पर पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला

वाराणसी, 10 अगस्त (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएं” विषयक पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला की शुरूआत हुई। भारत अध्ययन केन्द्र में आयोजित कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा, दर्शन, साहित्य, कला, लोक परम्परा, संस्कृति, संस्थाओं एवं भारतीय मेधा के विभिन्न आयामों का समग्र अध्ययन और विमर्श करना है। कार्यशाला का आयोजन 10 से 31 अगस्त, 2026 तक हाइब्रिड माध्यम से किया जा रहा है।

कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर बीएचयू कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने भारत अध्ययन से जुड़े केन्द्रों और संस्थाओं को मिलकर नई दिशा और दशा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ऐसे केन्द्रों का संचालन इस प्रकार होना चाहिए कि उनसे समाज और अकादमिक जगत को नई रोशनी और नए ज्ञान की प्राप्ति हो। साहित्य, कला, दर्शन, समाज और संस्कृति जैसे विभिन्न क्षेत्रों को अलग-अलग खाँचों में देखने के बजाय इनके अंतर्सम्बन्धों को समझते हुए सतत अध्ययन की आवश्यकता है। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि साहित्य, कला, दर्शन, समाज, संस्कृति और अन्य ज्ञान-विधाओं को समेकित रूप से देखने की आवश्यकता है। कार्यशाला में बतौर मुख्य वक्ता, नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि भारत की परम्पराओं, संस्थाओं और व्यक्तियों के योगदान तथा भारतीय दर्शन को विश्व के सामने प्रस्तुत करने में भारत अध्ययन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि भारत अध्ययन अपने आप में अत्यंत व्यापक विषय है, जिसमें भारतीय ज्ञान-सम्पदा के विराट पक्षों को समाहित करने का प्रयास किया जाता है। भारत की ज्ञान परम्परा को समझने के लिए विभिन्न विषयों और अनुशासनों के बीच संवाद एवं समन्वय आवश्यक है।

प्रो. सिंह ने कहा कि भारत में बुद्ध के समकालीन अनेक दार्शनिक परम्पराओं और विचारधाराओं का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय बौद्धिक परम्परा की व्यापकता को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि नालंदा की परम्परा में शब्दविद्या, शिल्पविद्या, चिकित्सा विद्या, आध्यात्मिक विद्या सहित विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता था। जोर देकर कहा कि विशेषज्ञता आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक संकुचित विशेषज्ञता ज्ञान की समग्रता को सीमित भी कर सकती है। इसलिए भारत अध्ययन के लिए अंतर्विषयी दृष्टिकोण आवश्यक है। प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास में वाद-विवाद और संवाद की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय मेधा का विकास निरंतर प्रश्न, तर्क, विमर्श और संवाद की प्रक्रिया से हुआ है। उन्होंने भारत और भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति पश्चिमी जगत में उत्पन्न हुई जिज्ञासा का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1785 में भगवद्गीता के अंग्रेजी अनुवाद और एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना के बाद भारतीय ज्ञान परम्परा के अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई गति मिली।

कार्यक्रम में बीएचयू कला संकाय की संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि भारत अध्ययन का कार्य “एकला चलो” का नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने का कार्य है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की जो छवि कभी-कभी भारतीय प्रवासी समुदाय अथवा कुछ बौद्धिक विमर्शों के माध्यम से प्रस्तुत होती है, वह वेदों और पुराणों में दिखाई देने वाली भारतीय संस्कृति की वास्तविक और व्यापक छवि से अलग हो सकती है।

अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी ने स्वागत वक्तव्य और कला केन्द्र के निदेशक डॉ. अभिजीत दीक्षित ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यशाला में विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं भारत अध्ययन में रुचि रखने वाले प्रतिभागी हाइब्रिड माध्यम से शामिल हुए। पन्द्रह दिवसीय कार्यशाला में लगभग 123 प्रतिभागी शामिल होंगे, जिनमें 45 प्रतिभागी ऑनलाइन माध्यम से तथा शेष प्रतिभागी ऑफलाइन माध्यम से सहभागिता करेंगे; इस दौरान कुल 30 व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे। कार्यशाला के द्वितीय सत्र के विशेष व्याख्यानों में प्रो. अवधेश प्रधान ने ‘‘पण्डित मदनमोहन मालवीय का भारत’’ तथा डॉ. पुनीत कुमार राय ने ‘‘स्वामी विवेकानन्द और भारत का सांस्कृतिक राष्ट्र बोध’’ विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी