काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में चार दिवसीय स्वतंत्रता दिवस समारोह का शुभारम्भ

 


—“रिदम्स ऑफ भारत: सेलिब्रेशन ऑफ फ्रीडम, कल्चर एंड यूनिटी” कार्यक्रम

वाराणसी, 12 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अंतर्गत बुधवार को “रिदम्स ऑफ भारत: सेलिब्रेशन ऑफ फ्रीडम, कल्चर एंड यूनिटी” कार्यक्रम की शुरूआत हुई। परिसर स्थित मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र की ओर से आयोजित चार दिवसीय कार्यक्रम में अकादमिक चर्चाओं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों एवं प्रतियोगिताओं के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों का उत्सव मनाया जा रहा है।

कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर “ट्रिब्यूट टू द रेवोल्यूशनरी फ्रीडम फाइटर्स: द अनसंग हीरोज ऑफ भारत” विषयक गोष्ठी में स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि बीएचयू “लघु भारत” का प्रतिनिधित्व करता है, जहां देश की विविधता अपने व्यापक रूप में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में विभिन्न विधाओं का एक साथ होना इसे विशिष्ट बनाता है। उन्होंने सभी से महामना मदन मोहन मालवीय के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए बड़े और सार्थक कार्य करने का प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम उन महान क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

गोष्ठी में बर्दवान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. स्मृति कुमार सरकार ने कहा कि हमें देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने बीरेन्द्र नाथ दासगुप्ता और यतीन्द्र नाथ के योगदान का उल्लेख किया। प्रो. सरकार ने तरिणी कान्त मजूमदार, शांति घोष, सुनीति चटर्जी, बरुण भट्टाचार्य, प्रद्योत भट्टाचार्य, मतिलाल मलिक, ननीबाला देवी, दुकारीबाला देवी, निकुंजबिहारी पाल, श्रीशचन्द्र मित्रा, कनाईलाल भट्टाचार्य, कनाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस सहित कई अल्पज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों से पहले भी अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने क्रांतिकारी गतिविधियों में अपने प्राण न्योछावर किए, लेकिन इतिहास में उनके योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने नई पीढ़ी को इन अनसुने नायकों के योगदान से परिचित कराने तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिन्द फौज की भूमिका को भी उचित रूप से सामने लाने की आवश्यकता बताई।

काजी नजरुल विश्वविद्यालय, आसनसोल के प्रो. अमिताव चटर्जी ने महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें बाघा जतिन के नाम से जाना जाता है, के जीवन और योगदान पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार ब्रिटिश शासन ने बंगाल के लोगों को कमजोर और साहसहीन बताकर उनके मनोबल को प्रभावित करने का प्रयास किया। बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने बाघा जतिन जैसे क्रांतिकारियों को संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने बताया कि बाघा जतिन ने दुर्गा पूजा जैसे सामाजिक अवसरों का उपयोग लोगों को एकजुट करने के लिए किया। अरविन्द घोष के नेतृत्व में उन्होंने बंगाल में एक बड़े और सक्रिय क्रांतिकारी संगठन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत सरकार के पूर्व राजनयिक एवं विशिष्ट अतिथि मनजीव सिंह पुरी ने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारत को गौरवान्वित करने वाला संस्थान है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने 2010 में भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़े अभिलेखों के दस्तावेजीकरण और प्रकाशन का कार्य शुरू किया, जो 2019 में पांच खंडों के प्रकाशन के साथ पूरा हुआ। मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र की समन्वयिका प्रो. सुतापा दास ने अतिथियों का स्वागत व डॉ. उषा त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी