आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण को पारे की उपलब्धता के लिए जामनगर घोषणा
—घोषणा का एक प्रमुख स्तंभ सतत पारद प्रबंधन,मरकरी बैंक की स्थापना
वाराणसी, 19 मार्च (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद संकाय अंतर्गत रस शास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग के प्रोफेसर आनंद चौधरी ने 6–7 मार्च को गुजरात के जामनगर स्थित आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान में आयोजित ‘रस मीमांसा’ संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञ के रूप में भाग लिया। इस अवसर पर आयुर्वेदिक औषधियों, विशेषकर रसौषधि, की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ऐतिहासिक “जामनगर घोषणा” को अपनाया गया।
यह घोषणा एक व्यापक रणनीतिक ढांचा प्रस्तुत करती है, जिसमें पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के साथ समन्वित करने पर बल दिया गया है। संगोष्ठी में आईआईटी, केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस), नियामक संस्थाओं और औषधि उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लेकर आयुर्वेदिक रसायन विज्ञान के भविष्य की दिशा तय की।
प्रो. चौधरी के अनुसार, दो दिनों तक चली गहन चर्चा और वैज्ञानिक विमर्श के बाद यह सहमति बनी कि पारद (मरकरी) युक्त औषधियों के उपयोग और शोध को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और प्रमाणिक बनाने के लिए ठोस सिफारिशें लागू की जाएँ। इसका उद्देश्य भारी धातुओं से जुड़े जोखिमों को समझते हुए उनके सुरक्षित उपयोग के लिए वैज्ञानिक आधार विकसित करना है।
—मरकरी बैंक की स्थापना पर जोर
जामनगर घोषणा का एक प्रमुख बिंदु सतत पारद प्रबंधन है। इसके तहत “मरकरी बैंक” की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत औद्योगिक अपशिष्ट, मानव-निर्मित उत्सर्जन और निष्क्रिय उपकरणों से पारे का पुनर्चक्रण किया जाएगा। केंद्रीय पुनर्चक्रण केंद्र स्थापित कर पारा एवं आर्सेनिक जैसी धातुओं को शुद्ध कर औषधीय-ग्रेड में परिवर्तित किया जाएगा, जिससे आयुर्वेदिक औषधियों के लिए एक नियंत्रित एवं नैतिक आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित हो सके।
—सुरक्षा को दी गई सर्वोच्च प्राथमिकता
घोषणा में उपभोक्ताओं और उत्पादकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सीसा, आर्सेनिक और गंधक (सल्फर) के प्रसंस्करण में सुरक्षित संचालन प्रक्रियाओं को अपनाने की सिफारिश की गई है। साथ ही, फार्माकोविजिलेंस प्रणाली को सुदृढ़ कर पारद-युक्त औषधियों के दीर्घकालिक प्रभावों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने पर बल दिया गया है।
—आधुनिक तकनीक के उपयोग पर बल
घोषणा में पारंपरिक निर्माण विधियों के साथ आधुनिक तकनीकी मानकीकरण को जोड़ने की बात कही गई है। उन्नत विश्लेषणात्मक उपकरणों के माध्यम से रासायनिक फिंगरप्रिंटिंग और प्रत्येक औषधि बैच का विस्तृत वैज्ञानिक प्रोफाइल तैयार करने की सिफारिश की गई है।
—व्यापक सहभागिता और भविष्य की दिशा
इस घोषणा की अवधारणा प्रो. आनंद चौधरी के प्रस्ताव से शुरू हुई, जिसे बाद में प्रो. तनुजा नेसरी और प्रो. बी.जे. पाटगिरि ने औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में देशभर से 274 स्नातकोत्तर एवं पीएचडी शोधार्थियों ने भाग लिया। विशेषज्ञों का मानना है कि “जामनगर घोषणा” आयुर्वेदिक औषधि उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण आधार दस्तावेज साबित हो सकती है, जो 21वीं सदी में रसौषधि चिकित्सा को सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दिशा प्रदान करेगी।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी