प्रयागराज : त्रिवेणी पर गूंजा वैदिक पुनर्जागरण का स्वर, विश्व कल्याण की कामना के साथ अतिरुद्र महाभिषेक का समापन
- काशी-प्रयाग की वैदिक और तीर्थ परंपरा को एक मंच पर लाया अतिरुद्र महाभिषेक
- काशी समेत देशभर के 70 वैदिक विद्वानों का हुआ समागम, घनपाठ से गूंजा त्रिवेणी तट
- कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के श्रीरुद्रम, नमकम् और चमकम् का हुआ पारंपरिक पाठ
प्रयागराज, 08 अक्टूबर (हि.स.)। संगम नगरी के त्रिवेणी संगम तट पर दो से आठ अक्टूबर तक चले अतिरुद्र महाभिषेक का गुरुवार को वैदिक मंत्रोच्चार और सामूहिक घनपाठ के साथ समापन हुआ। काशी की विद्या परंपरा और प्रयाग की तीर्थ-संस्कृति को एक मंच पर लाने वाले इस आयोजन में देशभर से आए 70 वैदिक विद्वानों ने सहभागिता की। विजय लक्ष्मी उत्सव मंडपम टैगोर टाऊन में सामूहिक घनपाठ से त्रिवेणी तट वैदिक मंत्रों से गूंज उठा। आयोजन ने वैदिक पाठ परंपरा, अनुष्ठानिक संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने का अवसर दिया।
आठ दिवसीय अनुष्ठान के दौरान कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के श्रीरुद्रम, नमकम् और चमकम् का पारंपरिक पाठ किया गया। आयोजन के चौथे और पांचवें दिन हुआ सामूहिक घनपाठ विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए विद्वानों का एक साथ वैदिक स्वर में पाठ करना उस मौखिक परंपरा की झलक प्रस्तुत करता रहा, जो अभ्यास, अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित होती आई है।
काशी की विद्या, प्रयाग की साधना का संगम
अतिरुद्र महाभिषेक में काशी समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आए वैदिक विद्वानों की मौजूदगी ने काशी-प्रयाग की सांस्कृतिक कड़ी को विशेष रूप से उभारा। आयोजन में आचार्य के. वेंकटरमण घनपाठी ने मुख्य आचार्यत्व की भूमिका निभाई। नागपुर के वेदमूर्ति आचार्य अर्विकार तथा स्वामी आनंद अवधूत महाराज की भी विशेष उपस्थिति रही। काशी से आए वेदपाठी ब्राह्मणों के साथ देश के अन्य हिस्सों के विद्वानों के समागम ने आयोजन को व्यापक वैदिक स्वरूप प्रदान किया।
वैदिक परंपरा के संरक्षण का संदेश
आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल प्राचीन परंपराओं के आयोजन तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य परंपराओं के अध्ययन, अभ्यास और उनके मूल स्वरूप को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। इस दृष्टि से वैदिक विद्वानों का यह समागम महत्वपूर्ण रहा। वैदिक मंत्रों के स्वर, घनपाठ की विशिष्ट पद्धति और पारंपरिक अनुष्ठानों को प्रत्यक्ष देखने का अवसर श्रद्धालुओं और युवाओं को मिला।
द्वादश लिंगों का अभिषेक
अतिरुद्र महाभिषेक के दौरान द्वादश लिंगों का दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, भस्म और गंगाजल से अभिषेक किया गया। महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी हुआ। अनुष्ठान के माध्यम से लोककल्याण, विश्वशांति और वैदिक परंपरा के संरक्षण की भावना को आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया। आयोजन में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना को भी प्रमुखता दी गई।
काशी-प्रयाग की विरासत को मिला नया सांस्कृतिक आयाम
काशी लंबे समय से वेद, दर्शन और आध्यात्मिक अध्ययन की परंपरा का प्रमुख केंद्र रही है, वहीं प्रयागराज का त्रिवेणी संगम तीर्थ और धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में दोनों परंपराओं को जोड़ने वाला अतिरुद्र महाभिषेक प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक आयाम देने वाला आयोजन रहा। त्रिवेणी संगम पर 70 वैदिक विद्वानों का समागम और सामूहिक घनपाठ न केवल वैदिक अनुष्ठान की परंपरा का प्रदर्शन रहा, बल्कि इस विरासत को निरंतर आगे बढ़ाने के संकल्प का भी संदेश देता रहा। आयोजन के समापन के साथ वैदिक परंपरा, लोककल्याण और विश्वशांति की कामना का स्वर त्रिवेणी से गूंजता रहा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश