सुलतानपुर का ऐतिहासिक दुर्गापूजा महोत्सव दशहरे से शुरू, समितियों में कई मुस्लिम सदस्य भी
सुलतानपुर, 20 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर में ऐतिहासिक दुर्गापूजा महोत्सव के लिये नौ दिन नवरात्रि की आराधना के बाद दशहरा से पंडालों की सजावट से शुरू होती है। पांच दिनों तक अलग अलग तरह से होने वाली भव्य सजावट और दुर्गा जागरण से शहर अलौकिक हो उठता है । यहाँ का विसर्जन सबसे आकर्षक होता है, जो परंपरा से हटकर पूर्णिमा को सामूहिक शोभायात्रा के रूप में शुरू होकर करीब 36 घंटे में सम्पन्न होता है। दुर्गापूजा महोत्सव में मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा जोड़ कर जुटे रहते हैं।
सुलतानपुर जिले का दुर्गापूजा महोत्सव कोलकाता से भी पहले स्थान रखता है। कोलकाता में संख्या बल या सज्जा में भले पहला स्थान रखता हो किंतु अन्य मायनों में यहाँ की दुर्गापूजा अपने आप में इकलौती है। केन्द्रीय दुर्गापूजा समिति के मीडिया प्रभारी सत्य प्रकाश गुप्ता ने बताया कि वर्तमान में शहर व आसपास क्षेत्रो में ढाई से तीन सौ के आसपास और जनपद भर मे करीब सात सौ से ज्यादा मूर्तियां प्रतिवर्ष स्थापित की जा रही हैं। जिसमें प्रतिवर्ष दो चार का इज़ाफा ही होता चला आ रहा है।
उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम स्थापित की गई मूर्तियों को कंहार डोली पर उठाकर चलते थे, जिसमें एक मूर्ति को उठाये जाने के लिये आठ कहार लगते थे। जो कि अब ट्रैक्टरों पर बिजली की जगमगाहट के साथ क्रमबद्ध झांकी के रुप में निकलती हैं। जिले की पहचान और गौरव दुर्गापूजा महोत्सव के रुप में इसलिये और बढ़ गया कि दशमी के दिन देश व प्रदेश के अन्दर मूर्तियां विसर्जित कर दी जाती हैं, पर यहां कुछ अलग ही परम्परा का इतिहास है। दशमी के दिन रावण का पुतला फूके जाने के पूर्व नौ दिनों तक शहर के रामलीला मैदान में सम्पूर्ण रामलीला की झांकी प्रस्तुत की जाती है और उसके बाद दशमी के दिन से सात दिनों दुर्गापूजा मेले का आयोजन होता है। जिसमें भरत-मिलाप से लेकर विविध कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वर्ष 1983 के बाद से शहर के अन्दर जगह-जगह अनेक मंदिरों का दृष्य कारीगरों द्वारा पंडाल के रुप में देखने को मिलता रहा है
केन्द्रीय पूजा व्यवस्था समिति के सुनील श्रीवास्तव की मानें तो आज भिखारीलाल सोनी इस दुनिया में नहीं है, पर उनके द्वारा रखी गई दुर्गापूजा महोत्सव की नींव मजबूत से मजबूत तर होती चली जा रही है। राधेश्याम की मानें तो उनका जनपद गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल था भी और है भी। वह इस बुनियाद पर कि पूर्व में दुर्गापूजा महोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के मोहर्रम और बारह रबीउल अव्वल का पर्व एक साथ पड़ गया था फिर भी यहां बिना विवाद के सकुशल संपन्न हुआ। समितियों में मुस्लिम सदस्य भी हैं और तमाम् मुस्लिम विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से दुर्गा भक्तो के सहयोग में लगे रहते हैं। आज दुर्गापूजा महोत्सव में मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा जोड़ सौहादर्य बनाये रखने के लिये जुटे रहते हैं।
पहली बार डोली पर निकली थी शोभायात्रा
पहली बार वर्ष 1959 में शहर के ठठेरी बाज़ार में बड़ी दूर्गा के नाम से भिखारीलाल सोनी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर यहां दुर्गापूजा महोत्सव के उपलक्ष्य में पहली मूर्ति स्थापना की थी, इस मूर्ति को उनके द्वारा बिहार प्रान्त से विशेष रूप से बुलाये गए तेतर पंडित व जनक नामक मूर्तिकारों ने प्रातिमा को अपने हाथों से बनाया था। विसर्जन पर उस समय शोभा यात्रा डोली में निकली गयी थी। डोली इतनी बड़ी होती थी जिसमे आठ व्यक्ति लगते थे। पहली बार जब शोभा यात्रा सीताकुंड घाट के पास पहुंची थी तभी जिला प्रशासन ने विर्सजन पर रोक लगा दिया था। जो बाद में सामाजिक लोगों के हस्तक्षेप के बाद विसर्जित हो सकी थी। यह दौर दो सालों तक ऐसे ही चला। वर्ष 1961 में शहर के ही रुहट्टा गली में काली माता की मूर्ति की स्थापना बंगाली प्रसाद सोनी ने कराई और फिर 1970 में लखनऊ नाका पर कालीचरण उर्फ नेता ने संतोषी माता की मूर्ति को स्थापित कराया। वर्ष 1973 में अष्टभुजी माता, श्री अम्बे माता, श्री गायत्री माता, श्री अन्नापूर्णा माता की मूर्तियां स्थापित कराई गई। इसके बाद से तो मानों जनपद की दुर्गापूजा में चार चांद लग गया और शहर, तहसील, ब्लाक एवं गांवों में मूर्तियों का तांता सा लग गया। समय के साथ महाेत्सव भव्य हाेता जा रहा है।
--------------
हिन्दुस्थान समाचार / दयाशंकर गुप्त