रविदास का समरसता मंत्र बनेगा 2027 का महामंत्र, हिन्दू एकजुटता की सबसे बड़ी बिसात बिछा रही भाजपा

 


- रविदास अभियान के जरिए 4.13 करोड़ मतदाताओं तक पहुंच की रणनीति, 66 उपजातियों पर रहेगा विशेष फोकस

लखनऊ, 25 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2027 से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने सबसे बड़े सामाजिक-राजनीतिक अभियान की रूपरेखा तैयार कर ली है। पार्टी अब गुरु रविदास के समरसता, समानता और सामाजिक सद्भाव के संदेश को केंद्र में रखकर अनुसूचित जाति की 66 उपजातियों तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है। संगठन की कोशिश इस अभियान के जरिए दलित समाज के विभिन्न वर्गों को सामाजिक समरसता, सामाजिक एकजुटता और व्यापक हिंदू समाज के साझा विमर्श से जोड़ने की है।

राजनीतिक हलकों में इसे 2027 के चुनाव से पहले भाजपा की सबसे बड़ी सामाजिक इंजीनियरिंग के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का मानना है कि 4.13 करोड़ से अधिक अनुसूचित जाति मतदाताओं के बीच स्थायी सामाजिक संवाद ही 2027 की चुनावी रणनीति की मजबूत नींव बन सकता है।

भाजपा के प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह ने कहा कि अभियान गुरु रविदास जयंती से शुरू होकर उनके 650वें प्रकाश पर्व तक चरणबद्ध तरीके से चलेगा। प्रदेश, क्षेत्र, जिला, मंडल और बूथ स्तर तक सम्मेलन, संगोष्ठियां, सामाजिक संवाद, मंदिर संपर्क, घर-घर संपर्क और प्रबुद्ध वर्ग की बैठकें आयोजित होंगी। हमारा उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं, बल्कि संत रविदास के समरसता संदेश को सामाजिक अभियान का रूप देना है।

बसपा के सामाजिक आधार पर नजर

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 4.13 करोड़ से अधिक है। इनमें चमार-जाटव, पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि, खटीक, धनुक, मुसहर, दुसाध समेत 66 उपजातियां शामिल हैं। दशकों तक इन वर्गों का बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राजनीति की रीढ़ माना जाता रहा है। अब भाजपा की रणनीति इन सभी उपजातियों तक अलग-अलग सामाजिक संपर्क स्थापित कर अपना आधार और मजबूत करने का है। संगठन ने प्रत्येक जिले में रविदास मंदिरों, दलित छात्रावासों, कोचिंग संस्थानों, समाज के शिक्षकों, चिकित्सकों, अधिवक्ताओं, उद्यमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रभावशाली परिवारों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इन लोगों के माध्यम से गांव, वार्ड और बूथ स्तर तक संपर्क अभियान चलाया जाएगा।

समरसता से सामाजिक विस्तार का फार्मूला

भाजपा इस अभियान को केवल दलित समाज तक सीमित नहीं रखना चाहती। रणनीति यह है कि अनुसूचित जाति के विभिन्न वर्गों को सामाजिक समरसता के माध्यम से व्यापक हिंदू समाज के साथ जोड़ते हुए साझा सामाजिक पहचान का संदेश दिया जाए। अभियान में मंदिरों, सामाजिक संगठनों, छात्र-युवा समूहों और महिला समूहों के जरिए लगातार संवाद स्थापित किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों, सामाजिक नेतृत्व और स्थानीय प्रभावशाली लोगों को एक मंच पर लाकर स्थायी सामाजिक नेटवर्क तैयार किया जा सकता है। इसी कारण यह अभियान संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

इतिहास से भविष्य तक की रणनीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित समाज हमेशा सत्ता परिवर्तन का निर्णायक कारक रहा है। कांशीराम और मायावती ने बहुजन आंदोलन के जरिए इसी सामाजिक आधार को राजनीतिक ताकत में बदला था। बाद के वर्षों में भाजपा ने गैर-जाटव दलित वर्गों के बीच अपनी पैठ बढ़ाई। अब पार्टी एक कदम आगे बढ़कर सभी 66 अनुसूचित जातियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषक सियाराम पांडेय का मानना है कि भाजपा 2027 की लड़ाई को केवल जातीय समीकरणों के बजाय सामाजिक समरसता और व्यापक सामाजिक एकजुटता के विमर्श के साथ लड़ने की तैयारी कर रही है। यदि पार्टी इस अभियान के जरिए विभिन्न उपजातियों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में सफल होती है तो इसका असर अनेक विधानसभा सीटों के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।

अभियान का ब्लूप्रिंट

- गुरु रविदास के 650वें प्रकाश पर्व 20 फरवरी 2027 तक चलेगा अभियान।

- प्रदेश की सभी 66 अनुसूचित जातियों तक पहुंचेगा संगठन।

- 4.13 करोड़ से अधिक एससी मतदाताओं तक संपर्क का लक्ष्य।

- रविदास मंदिर, छात्रावास और कोचिंग संस्थान बनेंगे संपर्क केंद्र।

- समाज के प्रभावशाली लोगों का जिला और बूथ स्तर पर नेटवर्क तैयार होगा।

- सामाजिक समरसता, संगठन विस्तार और व्यापक हिंदू समाज से संवाद पर जोर।

क्यों अहम है यह अभियान?

- पारंपरिक सामाजिक आधार वाले क्षेत्रों पर विशेष नजर।

- बूथ स्तर तक सामाजिक पहुंच मजबूत करने की तैयारी।

- सामाजिक समरसता को संगठनात्मक शक्ति में बदलने की कोशिश।

- 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दीर्घकालिक सामाजिक आधार मजबूत करने की रणनीति।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश