सनातन से अलग हुए पंथ स्वयं को सनातन धर्म से संबंधित समझें : स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
प्रयागराज, 04 अक्टूबर (हि.स.)। सभी के पूर्वज वैदिक सनातनी आर्य हिंदू रहे हैं। इसलिए सनातन धर्म से अलग हुए पंथों को स्वयं को सनातन धर्म से संबंधित ही मानना चाहिए। उक्त बातें रविवार को झूंसी स्थित पुरी पीठ के प्रयागराज केंद्र श्री शिवगंगा आश्रम में अपने दस दिवसीय प्रवास के दौरान शिष्यों और श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए गोवर्धन मठ, पुरी (ओडिशा) के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कही।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वटवृक्ष से अलग हुई शाखा कमजोर होकर अपना अस्तित्व खो देती है, उसी प्रकार सनातन धर्म से अलग हुए पंथों की स्थिति भी हो सकती है। इस दौरान उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय विषयों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए।
उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों में भी जिन पूर्वजों ने हिंदू धर्म को बनाए रखा, उनके प्रति श्रद्धा और आस्था कायम रखनी चाहिए। जनसंख्या नियंत्रित रहे, समाज दुर्व्यसनों से मुक्त हो और प्रत्येक व्यक्ति की जीविका जन्म से सुरक्षित हो, यह सनातन धर्म के सिद्धांतों से ही संभव है।
शंकराचार्य ने कहा कि मनुष्य को जीवन में सर्वेश्वर के बल, सेवा, संवाद और संगठन के सिद्धांतों को अपनाना चाहिए। इन सिद्धांतों पर चलने वाला व्यक्ति जीवन की विसंगतियों से बच सकता है। उन्होंने प्रकृति के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि मनुष्य को विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ और उसका अत्यधिक दोहन नहीं करना चाहिए। जब मनुष्य स्वस्थ परिवर्तन का मार्ग नहीं अपनाता, तब प्रकृति स्वयं परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था की तीन ‘सी’—क्लास एंड को-एजुकेशन, क्लब और कोर्ट—ने भारत की सामाजिक और शैक्षिक व्यवस्था को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र बनेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
इस अवसर पर शंकराचार्य के निजी सचिव स्वामी निर्विकल्पानंद सरस्वती, प्रफुल्ल ब्रह्मचारी, हृषिकेश ब्रह्मचारी, आदेश भूषण पांडेय, डॉ. दिव्यकांत त्रिपाठी, समाजसेवी संतोष त्रिपाठी, बीपी सिंह, डॉ. एलएस ओझा, शुभम सिंह, सुरेंद्र पांडेय, पंडित आलोक मिश्र और अधिवक्ता मनोज त्रिपाठी सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल