भारतीय ज्ञान परंपरा में आनंद से जीवन और जगत के समग्र कल्याण की अवधारणा : आचार्य दिव्य चेतनानंद
राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में आनन्दसूत्रम् का योगदान’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, दार्शनिक और सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर हुआ मंथन
प्रयागराज, 24 सितंबर (हि.स.)। भारतीय ज्ञान परंपरा में आनंद को केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसे जीवन और जगत के समग्र कल्याण से जोड़ा गया है। उपनिषदों में आनंद को ब्रह्म से जोड़ा गया है और आनन्दमूर्ति प्रभात रंजन सरकार ने इसी अवधारणा को ‘आनन्दसूत्रम्’ के माध्यम से विशिष्ट दार्शनिक स्वरूप दिया। यह बात गुरुवार को राष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य अतिथि आचार्य दिव्य चेतनानंद, सचिव, आनंद मार्ग प्रचारक संघ, कोलकाता ने कही।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में मानविकी विद्या शाखा के तत्वावधान में गुरुवार को तिलक शास्त्रार्थ सभागार में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में आनन्दसूत्रम् का योगदान’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में आनन्दसूत्रम् के दार्शनिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।
आचार्य दिव्य चेतनानंद ने कहा कि किसी भी सूत्र को केवल उसके शब्दार्थ तक सीमित रखकर नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे निहित भाव और दार्शनिक आधार को समझना भी आवश्यक है। इसी आधार पर प्राचीन भारतीय चिंतन और दर्शन से उसका सार्थक तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आनन्दसूत्रम् की विशेषता यह है कि इसमें आध्यात्मिक साधना के साथ मनो-बौद्धिक विकास तथा सामाजिक-आर्थिक चिंतन को भी स्थान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी, उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग और विकेंद्रीकृत आर्थिक नियोजन जैसी अवधारणाएं संतुलित समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। भोजन, वस्त्र और आवास के साथ शिक्षा और चिकित्सा को भी मानव जीवन की आवश्यक जरूरतों में शामिल किया गया है।
जनसंपर्क अधिकारी डॉ. प्रभात चन्द्र मिश्र ने बताया कि संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों को समकालीन संदर्भ में समझना और ज्ञान, समरसता तथा मानवीय मूल्यों के प्रसार को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों को भारतीय दर्शन एवं चिंतन की विभिन्न धाराओं को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर देते हैं।
विशिष्ट अतिथि प्रो. राजेंद्र सिंह रज्जू भैय्या विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी ने कहा कि आनन्दसूत्रम् का वेद, उपनिषद, आगम, सांख्य, योग और वेदांत सहित भारतीय दर्शन की विभिन्न परंपराओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। इसके सूत्रों पर संस्कृत और हिंदी में विस्तृत वार्तिक और भाष्य तैयार किए जाने की भी आवश्यकता है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता मानविकी विद्या शाखा के निदेशक प्रो. सत्यपाल तिवारी ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन की यात्रा मूल रूप से आनंद की खोज की यात्रा रही है। वैदिक काल से भारतीय मनीषा जीवन के मूल स्वरूप और अंतिम सत्य की खोज में निरंतर प्रयासरत रही है।
संयोजक प्रो. विनोद कुमार गुप्त ने स्वागत और विषय प्रवर्तन किया। संचालन शोध छात्र दिग्विजय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डॉ. अतुल कुमार मिश्र ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल