मां कल्याणी ने चंद्रघंटा स्वरूप में दिए दर्शन, भक्तों ने की आराधना

 




मंदिर में सुबह मंगला आरती से देर रात तक लगी रही श्रद्धालुओं की कतार, शतचंडी महायज्ञ में शामिल हुए भक्त

प्रयागराज, 13 अक्टूबर (हि.स.)। शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। मां के दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंजता रहा। भक्तों ने मां के चरणों में शीश नवाकर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की। महिलाओं ने भजन गाकर मां की महिमा का गुणगान किया।

मंदिर में सुबह 5:15 बजे पंडित श्याम जी पाठक ने मंगला आरती की। इसके बाद दर्शन-पूजन का सिलसिला शुरू हुआ, जो मध्यरात्रि 12:30 बजे तक चलता रहा। मां का चंद्रघंटा स्वरूप में मनोहारी शृंगार किया गया। मां सिंह पर विराजमान थीं और अपनी दसों भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए थीं। सोने-चांदी के आभूषणों के साथ बेला और गुलाब के पुष्पों से मां का शृंगार किया गया। गर्भगृह को रजनीगंधा, गुलाब और गेंदे के फूलों से सजाया गया था।

शाम सात बजे मंदिर अध्यक्ष पंडित सुशील पाठक ने शंख, घंटा और घड़ियाल की गूंज के बीच मां की महाआरती उतारी। इसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। आरती के दौरान पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो गया। महिलाओं की मंडली ने *‘अंगना पधारो महारानी, माई कल्याणी माई’ सहित अन्य भजनों के माध्यम से मां का गुणगान किया।

पंडित सुशील पाठक ने बताया कि मंदिर में वैदिक ब्राह्मणों द्वारा शतचंडी महायज्ञ कराया जा रहा है। इसमें श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया। मंदिर परिसर में बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराया गया।

आज मां कूष्मांडा स्वरूप में देंगी दर्शन

मंदिर के मीडिया प्रभारी राजेश केसरवानी ने बताया कि बुधवार को मां कल्याणी देवी का शृंगार भगवती कूष्मांडा के स्वरूप में किया जाएगा। मां सिंह पर सवार होकर अष्टभुजी स्वरूप में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए दर्शन देंगी। उनका शृंगार मोती के आभूषणों और विभिन्न प्रकार के पुष्पों से किया जाएगा। सेवादार गर्भगृह को फूलों से सजाएंगे।

उन्होंने बताया कि मां का दर्शन-पूजन सुबह 5:30 बजे से दोपहर एक बजे तक होगा। मध्य शृंगार के बाद शाम छह बजे से मध्यरात्रि 12:30 बजे तक श्रद्धालु मां के दर्शन कर सकेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल