भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदू जीवन दर्शन को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता : गुणवंत कोठारी
धर्म पूजा पद्धति नहीं, बल्कि ऐसा आचरण है जिससे किसी को पीड़ा न पहुंचे, ऋषियों द्वारा विकसित जीवन पद्धति ही हिंदू दर्शन
प्रयागराज, 14 जून (हि.स.)। त्रिकालदर्शी ऋषियों ने गहन चिंतन और मनन के बाद जिस जीवन पद्धति का विकास किया, वही हिंदू जीवन दर्शन है। उक्त बातें रविवार को चंद्रशेखर आजाद पार्क स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, गंगानाथ झा परिसर में हिंदू आध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान तथा विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दुत्व दर्शन, दृष्टि और विचार’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य वक्ता हिंदू आध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक गुणवंत कोठारी ने कहीं।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को योजनाबद्ध तरीके से भारतीय ज्ञान परंपरा से दूर किया गया है, इसलिए आज आवश्यकता है कि हिंदू जीवन मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नए अनुसंधानों और तर्कों के साथ युवाओं तक पहुंचाया जाए।
उन्होंने कहा कि हिंदू समाज चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—पर आधारित है। धर्म और मोक्ष जीवन रूपी सरिता के दो किनारे हैं तथा संतुलित और सार्थक जीवन के लिए चारों पुरुषार्थ आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि ‘‘मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और कहां जाना है’’ जैसे मूलभूत प्रश्नों के उत्तर हिंदू दर्शन में निहित हैं। हमारे धर्मशास्त्र व्यक्ति और समाज दोनों के समग्र विकास का मार्ग दिखाते हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदू दर्शन संपूर्ण सृष्टि में परमात्मा की उपस्थिति को स्वीकार करता है। धरती, नदियां, हिमालय, वृक्ष और प्रकृति के अन्य स्वरूप हिंदू समाज के लिए पूजनीय हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा में जल चढ़ाने और वृक्षों की सेवा का भाव प्रकृति के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है। 16 संस्कार व्यक्ति और परिवार को उच्च जीवन मूल्यों की ओर ले जाते हैं तथा हिंदू समाज में नारी को पूजनीय स्थान प्राप्त है।
गुणवंत कोठारी ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है। जो व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ न करना ही धर्म का मूल स्वरूप है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में निहित वैज्ञानिक तथ्यों को उजागर करना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की मांग है।
विशिष्ट वक्ता एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन और सांस्कृतिक विचार है। उन्होंने कहा कि वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना हिंदू जीवन दर्शन का मूल है तथा प्रकृति और नदियों की रक्षा मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
संस्थान के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सोमकांत शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदुत्व केवल विचार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना है। उन्होंने कहा कि प्राचीन हिंदू जीवन पद्धति को वर्तमान परिवेश में पुनः स्थापित करने के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार करना इस संगोष्ठी का उद्देश्य है।
डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी ने कहा कि युवाओं के मन में परंपराओं को लेकर उठने वाले प्रश्नों का तार्किक और वैज्ञानिक उत्तर दिया जाना चाहिए। वहीं हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा ने कहा कि कोरोना काल में हिंदू जीवन शैली की प्रासंगिकता पूरे विश्व ने अनुभव की।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। संगोष्ठी में क्षेत्र संगठन मंत्री अमरनाथ, संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. मुरारजी त्रिपाठी, प्रांत कार्यकारिणी सदस्य नागेंद्र जी, मानव चौरसिया, विंध्याचल, पार्षद भोला तिवारी सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविद, अधिवक्ता, मातृशक्ति एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल