मूलभूत मानवाधिकारों का स्रोत भी वेद हैं : प्रो. संतोष कुमार शुक्ल

 




इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का समापन, विद्वानों ने वेदों के ज्ञान और प्रासंगिकता पर रखे विचार

प्रयागराज, 09 अक्टूबर (हि.स.)। मूलभूत मानवाधिकारों का स्रोत भी वेदों में निहित है। वेद केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की धरोहर हैं। इनमें ज्ञान, भाषा, साहित्य और सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विचार समाहित हैं। इसलिए वेदों का अध्ययन और उनकी रक्षा करना सभी का कर्तव्य है। यह विचार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. संतोष कुमार शुक्ल ने शुक्रवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि चारों वेद स्वयं ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। वेदों में निहित ज्ञान को शाश्वत माना गया है। भारतीय साहित्य की विभिन्न विधाओं और भाषा के विकास को समझने में भी वेदों का महत्वपूर्ण स्थान है। कविता, गद्य और गीत जैसी साहित्यिक विधाओं की परंपरा को वेदों से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने कहा कि भाषा की उत्पत्ति और विकास पर विचार करने वाले प्राचीनतम ग्रंथों में वेद प्रमुख हैं। पश्चिमी विद्वानों की भाषा संबंधी अवधारणाओं के संदर्भ में भी वैदिक भाषा का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

वेदों में समाहित है ज्ञान का विशाल भंडार

प्रो. शुक्ल ने कहा कि वेदों में सृष्टि की उत्पत्ति से संबंधित विचार भी मिलते हैं। वेदों के अध्ययन की विधि को स्वाध्याय कहा गया है। वेदों के संरक्षण और अध्ययन की समृद्ध परंपरा रही है। इनके पाठ की आठ विधियां हैं, जिनमें जटा, माला और शिखा जैसी विधियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि वेदों पर आधारित शास्त्रों का भी अपना विशेष महत्व है। वेदों में निहित ज्ञान को समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अध्ययन-अध्यापन को बढ़ावा देना जरूरी है।

बहुविषयक ज्ञान का प्रमुख आधार हैं वेद

समापन सत्र में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल प्रताप गिरि ने कहा कि वेद बहुविषयक ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। इनमें निहित ज्ञान का अध्ययन और अध्यापन निरंतर जारी रहना चाहिए। उन्होंने वैदिक साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए इसके व्यापक अध्ययन की आवश्यकता बताई।

इससे पहले समापन सत्र का संचालन संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रचेतस ने किया। विभाग के विद्यार्थियों ने वैदिक एवं लौकिक मंगलाचरण के बाद स्वागत गीत प्रस्तुत किया। सहायक आचार्या डॉ. निरुपमा त्रिपाठी ने मौखिक स्वागत किया, जबकि डॉ. विनोद कुमार ने तीन दिवसीय संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

विद्वानों ने साझा किए अनुभव और शोध विचार

हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के नौनिहाल गौतम और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के डॉ. वेदव्रत ने संगोष्ठी में भाग लेने के अनुभव साझा किए। शोधार्थी मयंकमणि त्रिपाठी ने कहा कि कम समय में उन्हें काफी ज्ञान प्राप्त हुआ। प्रो. राजेश्वर मिश्र ने अपने आशीर्वचन में संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों की तुलना यज्ञ की परंपरा से की।

दिनभर चले शैक्षणिक सत्रों में नालंदा विश्वविद्यालय के प्रो. विजय कुमार कर्ण ने वैदिक मंत्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। एक अन्य सत्र के अध्यक्ष प्रो. प्रयागनारायण मिश्र ने कहा कि वेदों में विज्ञान के साथ पराविज्ञान से संबंधित विचार भी मिलते हैं। विभिन्न विद्वानों ने अपने शोधपरक विचारों के माध्यम से वैदिक साहित्य की महत्ता को रेखांकित किया।

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. संत प्रकाश तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। समापन सत्र में संस्कृत विभाग के शिक्षक, विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संबद्ध महाविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल