हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने का लेना होगा संकल्प : प्रो. अजय जैतली

 




अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञान का विकास होने पर ही देश आगे बढ़ेगा : प्रो. आशीष खरे

प्रयागराज, 17 सितंबर (हि.स.)। हिंदी हमारी संस्कृति और मानवीय मूल्यों को अभिव्यक्त करने वाली भाषा है। हमने हिंदी को भावनाओं की भाषा तो बनाया है, लेकिन इसे ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने के लिए अभी और प्रयास करने की आवश्यकता है। हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने का संकल्प लेना होगा। यह बातें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अजय जैतली ने गुरुवार को राजभाषा पखवाड़ा-2026 के शुभारंभ अवसर पर कही।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजभाषा अनुभाग की ओर से तिलक भवन में दीप प्रज्वलन के साथ राजभाषा पखवाड़े की शुरुआत हुई। 17 से 30 सितंबर तक चलने वाले पखवाड़े में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में करीब 11 कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारी हिस्सा लेंगे।

प्रो. अजय जैतली ने कहा कि भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है और हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सिखाती है। हिंदी के प्रति हमारा दायित्व भी है, क्योंकि इसी भाषा ने हमें संस्कार दिए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से भाषा के बदलते स्वरूप की ओर भी ध्यान दिलाया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव एवं राजभाषा कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष प्रो. आशीष खरे ने कहा कि जिन देशों ने प्रगति की है, उन्होंने अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञान को विकसित करने पर जोर दिया है। जब हम अपनी भाषा में सोचेंगे तो उसी भाषा में काम करने के लिए भी स्वाभाविक रूप से प्रेरित होंगे। उन्होंने विद्यार्थियों से राजभाषा पखवाड़े के विभिन्न कार्यक्रमों में अधिकाधिक सहभागिता करने का आह्वान किया।

राजभाषा अनुभाग के संयोजक प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने अतिथियों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि हिंदी का विकास सामूहिक सहभागिता से ही संभव है। पखवाड़े के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी, जिनमें नियमित विद्यार्थी, शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारी भाग ले सकेंगे। उन्होंने 23 सितंबर को विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता में अधिकाधिक सहभागिता की अपील की।

जनसंपर्क अधिकारी प्रो. जया कपूर ने भारतीय भाषाओं के तकनीकी क्षेत्र में अधिक प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी में अधिक पढ़ने-लिखने के साथ देवनागरी लिपि के संरक्षण और प्रसार के लिए भी निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

अतिथियों को विश्वविद्यालय के पुरा छात्र और प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के कविता-संग्रह, अंगवस्त्र और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। संचालन राजभाषा अनुवादक हरिओम ने तथा धन्यवाद ज्ञापन राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सदस्य प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर ने किया।

कवि गोष्ठी में गूंजा कविता का स्वर

उद्घाटन समारोह के बाद कवि गोष्ठी आयोजित हुई। अध्यक्षता वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र पाण्डे ने की। इसमें प्रो. संतोष चतुर्वेदी, डॉ. कल्पना वर्मा, डॉ. शिव कुमार यादव, डॉ. जनार्दन, डॉ. श्लेष गौतम, डॉ. रंजना और डॉ. अमरजीत राम ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवि गोष्ठी का संचालन डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों और महाविद्यालयों के शिक्षक, छात्र-छात्राएं एवं शोधार्थी मौजूद रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल