भारतीय ज्ञान परंपरा असत्य से सत्य और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली : कुलपति वंगछुग
- क्षेत्रीय भाषाएं छोटी-छोटी नदियां, इनके समागम से समृद्ध होगी भारतीय भाषा
वाराणसी, 13 सितम्बर (हि.स.)। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ के कुलपति भिक्षु प्रो. (डा.) वंगछुग दोर्जे नेगी ने कहा कि भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाएं ज्ञान की छोटी-छोटी नदियों की तरह हैं। इनके समागम से भारतीय भाषाएं और अधिक समृद्ध और प्रभावशाली बनेंगी। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल भाव 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय' में निहित है। यह परंपरा मनुष्य को असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाली है। राग, द्वेष और मोह जैसी विकृतियां चेतना पर अंधकार डालती हैं। जब तक इनसे मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक मनुष्य वास्तविक सुख और ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य शरीर और भौतिक सुविधाओं पर अधिक ध्यान दे रहा है, जबकि चेतना और चित्त की उपेक्षा हो रही है। जिस प्रकार शरीर के लिए रोटी, कपड़ा और मकान आवश्यक है, उसी प्रकार चेतना के लिए शील, समाधि और ध्यान आवश्यक हैं। इनके बिना वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है।
वाराणसी स्थित महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में रविवार को हिन्दुस्थान समाचार की ओर से आयोजित भारतीय भाषा समागम-2026 में भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाओं और समृद्ध भारत को लेकर गहन मंथन हुआ। बतौर विशिष्ट अतिथि कुलपति नेगी ने पुनर्जन्म की अवधारणा पर कहा कि शरीर, परिवार, संसार और धन-दौलत के प्रति आसक्ति मनुष्य को बांधे रखती है। मृत्यु के समय भी यदि व्यक्ति इन मोहों से मुक्त नहीं हो पाता तो जन्म-मृत्यु का क्रम जारी रहता है। मृत्यु के समय शरीर और सांसारिक आसक्तियों से शांत भाव से मुक्त होना ही अमृत की ओर जाने का मार्ग है।
तीन कसौटियों पर खरी उतरे वही परंपरा
कुलपति ने कहा कि हर प्रथा को परंपरा नहीं कहा जा सकता। वास्तविक परंपरा का स्रोत प्रमाणित होना चाहिए, वह निरंतर और अविच्छिन्न रूप से चलती आनी चाहिए तथा चिंतन और विश्लेषण की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। इन तीन गुणों से युक्त परंपरा ही ज्ञान परंपरा कहलाती है।
भाषाओं के समागम से ही भारतीय ज्ञान परंपरा की शक्ति बढ़ेगी
भाषा की शक्ति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा वास्तव में जादू जैसी है। अलग-अलग अक्षर जब मिलकर शब्द बनाते हैं तो असंख्य विचार, भाव, चिंतन, दर्शन और अनुभव व्यक्त करने में सक्षम हो जाते हैं। कोई भी भाषा अपने विचार, दर्शन और कला को अभिव्यक्त करने में सक्षम है। इसलिए भाषाओं को लेकर संकीर्णता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ भाषा भी लगातार विकसित होती है। नए आविष्कारों के साथ नए शब्दों की जरूरत पड़ती है। इसलिए भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से जोड़ते हुए निरंतर समृद्ध करना होगा। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाएं विभिन्न छोटी नदियों के समान हैं। संस्कृत और हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों और भावों का अधिक से अधिक समावेश होना चाहिए। सभी भाषाओं के समागम से ही भारतीय भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा की शक्ति बढ़ेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी