आपदा से पार पाने में पीड़ितों के साथ मजबूती से खड़ी है योगी सरकार, सहायता राशि बढ़ाते हुए प्रबंधन किया हाईटेक
योगी सरकार में आपदा प्रबंधन को मिली नई ताकत, एनडीआरएफ पर निर्भरता से अपने एसडीआरएफ तक पहुंचा यूपी
पहले सीमित आपदाओं तक राहत, अब सर्पदंश, डूबने और विभिन्न मामलों में घायलों को भी सरकारी मदद
लखनऊ, 20 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी सरकार बनने के बाद आपदा प्रबंधन का ढांचा राहत देने की पारंपरिक व्यवस्था से आगे बढ़कर संगठित, तेज और तकनीक आधारित सिस्टम में बदला है। पहले सीमित आपदाओं पर ही सरकारी सहायता मिलती थी और राज्य के पास अपना समर्पित बचाव बल नहीं था। अब एसडीआरएफ, मजबूत राहत तंत्र, विस्तारित आपदा की परिभाषा, मानकीकृत राहत सामग्री और सात दिन में सहायता भुगतान जैसी व्यवस्थाओं ने आपदा प्रभावित लोगों को बड़ी राहत दी है।
वर्ष 2017 से पहले सीमित था आपदा प्रबंधन का दायरा
भारत में मौजूदा आपदा प्रबंधन व्यवस्था की नींव आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 से पड़ी। 2004 की हिंद महासागर सुनामी के बाद 26 दिसंबर 2005 को यह कानून अस्तित्व में आया। इसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और राज्यों में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की व्यवस्था की गई। उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूपीएसडीएमए) भी 12 जनवरी 2011 से अस्तित्व में था, लेकिन जमीनी स्तर पर आपदा प्रबंधन की क्षमता सीमित थी।
वर्ष 2017 से पहले देश में अधिसूचित आपदाओं की सूची मुख्य रूप से 12 आपदाओं तक सीमित थी। इनमें चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट हमला और शीतलहर शामिल थे। ऐसे में सांप के काटने, आवारा सांड के हमले, बाढ़ के अलावा अन्य कारणों से डूबने, नाव दुर्घटना या कई स्थानीय घटनाओं में मौत होने पर राज्य आपदा राहत कोष से सहायता का स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ता था। बिजली गिरने या नाव दुर्घटना जैसी घटनाओं में सहायता के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष का सहारा लेना पड़ता था, जबकि डूबने और सर्पदंश से मौत के कई मामलों में निर्धारित मुआवजा तक नहीं था।
अपना बचाव बल न होने से एनडीआरएफ पर रहती थी निर्भरता
2017 से पहले उत्तर प्रदेश में आपदा के समय स्थानीय पुलिस, राजस्व विभाग और प्रशासनिक अमला ही मुख्य रूप से राहत और बचाव कार्य संभालता था। गंभीर स्थिति में केंद्र से एनडीआरएफ की टीम आने का इंतजार करना पड़ता था। राज्य के पास हर तरह की आपदा से निपटने के लिए अपना प्रशिक्षित और समर्पित बचाव बल नहीं था। यही वह क्षेत्र था जहां 2017 के बाद बड़ा बदलाव हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) का गठन किया गया। इसमें मेडिकल और फायर टीमों को भी शामिल किया गया और जवानों को विभिन्न प्रकार की आपदाओं में राहत एवं बचाव के लिए प्रशिक्षित किया गया।
इससे बाढ़, भूकंप, आग, दुर्घटना, भवन ढहने और अन्य आपदाओं के समय राज्य की अपनी प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ी। अब हर बड़ी घटना में केवल केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भरता नहीं रह गई है। राज्य पुलिस नेतृत्व ने भी विभिन्न मंचों पर एसडीआरएफ के गठन के बाद प्रदेश की आपदा प्रबंधन क्षमता में हुए सुधार को महत्वपूर्ण उपलब्धि माना है।
2026 में हाईटेक कमांड सेंटर से और मजबूत हुआ सिस्टम
योगी सरकार ने आपदा प्रबंधन को केवल बल गठन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके संस्थागत ढांचे को भी आधुनिक बनाया है। 2026 में यूपीएसडीएमए के लिए नया हाईटेक मुख्यालय तैयार किया गया है। 200 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बने इस भवन में 24 घंटे सक्रिय इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर और डिजिटल कमांड-कंट्रोल सुविधाएं हैं। इस तरह आपदा के दौरान सूचना जुटाने, जिलों से समन्वय करने, बचाव दलों को निर्देश देने और राहत कार्यों की निगरानी को ज्यादा व्यवस्थित किया जा सकता है। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से सरकार का फोकस अब आपदा आने के बाद राहत देने के साथ-साथ पहले से तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया पर भी है।
आपदा की परिभाषा बढ़ी, सर्पदंश और डूबने पर भी मदद
वर्ष 2017 के बाद सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक आपदा की व्यावहारिक परिभाषा का विस्तार रहा। राज्य स्तर पर ऐसी घटनाओं को भी राहत के दायरे में लाया गया, जिनमें पहले प्रभावित परिवारों को सरकारी सहायता नहीं मिलती थी। नदी, तालाब, नाले या गड्ढे में डूबने, बिजली गिरने, भूकंप, भूस्खलन और मिट्टी धंसने जैसी घटनाओं के अलावा सांड के हमले और सर्पदंश से मौत जैसे मामलों को भी सहायता के दायरे में शामिल किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली ऐसी घटनाओं के पीड़ित परिवारों को बड़ा सहारा मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर भी अधिसूचित आपदाओं की सूची का विस्तार हुआ है। हीटवेव यानी लू और बिजली गिरने को इसमें शामिल किए जाने से राज्यों को इन घटनाओं में एसडीआरएफ की राशि से राहत, इलाज और पुनर्वास संबंधी सहायता देने का अधिकार मिला।
मुआवजे में बड़ा बदलाव, 1.50 लाख से बढ़कर 04 लाख रुपये
आपदा प्रबंधन में बदलाव का सबसे सीधा असर आर्थिक सहायता पर दिखाई देता है। 2010-15 के दौरान आपदा में मृत्यु पर अनुग्रह राशि करीब 1.50 लाख रुपये थी। पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त पक्के मकान के लिए मैदानी क्षेत्रों में करीब 70 हजार रुपये और कपड़े-बर्तन के लिए केवल 1,300 से 1,400 रुपये तक की सहायता मिलती थी।
बाद में राष्ट्रीय एसडीआरएफ व एनडीआरएफ मानकों में संशोधन के साथ मृत्यु पर सहायता बढ़कर 04 लाख रुपये हो गई। पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त पक्के मकान के लिए सहायता 95,100 रुपये तक पहुंची। कपड़े और बर्तन के लिए सहायता भी बढ़कर 1,800 से 2,000 रुपये प्रति परिवार हुई। गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के लिए भी सहायता राशि में 12,700 रुपये तक वृद्धि की गई। बिजली गिरने से मौत जैसे मामलों में जहां पहले सहायता मुख्य रूप से मुख्यमंत्री राहत कोष पर निर्भर थी, अब निर्धारित मानकों के तहत एसडीआरएफ से 4 लाख रुपये की सहायता का प्रावधान है। इसी तरह बाढ़ के अलावा डूबने और सर्पदंश से मौत के मामलों में भी 4 लाख रुपये तक की सहायता का प्रावधान किया गया है।
भुगतान में तेजी, सात दिन में सहायता देने का लक्ष्य
आपदा राहत व्यवस्था में केवल मुआवजे की राशि बढ़ाना ही बदलाव नहीं रहा, बल्कि भुगतान की प्रक्रिया को भी सरल बनाने पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से सर्पदंश के मामलों में पहले पोस्टमार्टम और बिसरा सुरक्षित रखने जैसी प्रक्रियाओं के कारण आर्थिक सहायता मिलने में लंबा समय लग सकता था। अब ऐसी प्रक्रिया में बदलाव करते हुए पात्र परिवार को जल्दी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। राज्य आपदा से संबंधित मृत्यु के मामलों में सात दिन के भीतर भुगतान करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे आपदा में परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट झेल रहे परिजनों को तत्काल मदद मिल सकती है।
राहत सामग्री अब सिर्फ खाना और तिरपाल तक सीमित नहीं
2017 से पहले बाढ़ या अन्य आपदाओं के समय राहत व्यवस्था मुख्य रूप से पका हुआ भोजन, आटा-चावल और तिरपाल जैसी बुनियादी जरूरतों तक सीमित रहती थी। राहत सामग्री की मात्रा और व्यवस्था में जिलों के स्तर पर भी अंतर देखने को मिलता था। अब उत्तर प्रदेश में राहत सामग्री को अधिक व्यवस्थित और मानकीकृत किया गया है। वर्तमान बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए खाद्यान्न किट में 17 प्रकार की सामग्री शामिल की जाती है। इसमें 10 किलो आटा, 10 किलो चावल, 10 किलो आलू, 5 किलो लाई, 2 किलो भुना चना, 2 किलो अरहर दाल, नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, 5 लीटर रिफाइंड तेल, माचिस, मोमबत्ती, बिस्किट और अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल हैं। इसके साथ पानी को सुरक्षित बनाने के लिए क्लोरीन टैबलेट और स्नान के साबुन भी दिए जाते हैं।
महिलाओं के लिए डिग्निटी किट की व्यवस्था
महिलाओं की जरूरत को ध्यान में रखते हुए डिग्निटी किट की व्यवस्था की गई है। इससे आपदा के समय महिलाओं के सम्मान से समझौता नहीं करना पड़ता। प्रशासन इस तरफ हर संभव मदद मुहैया करा रहा है। वहीं प्रभावित परिवारों के पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी राहत तंत्र का हिस्सा बनी है।
बाढ़ चौकियों से मेडिकल टीम तक राहत तंत्र हुआ व्यापक
उत्तर प्रदेश में बाढ़ के दौरान अब राहत और बचाव की तैयारी पहले से कहीं अधिक व्यापक है। संवेदनशील क्षेत्रों में बाढ़ चौकियां और राहत शिविर बनाए जा रहे हैं। नाव और मोटरबोट के जरिए प्रभावित इलाकों तक राहत सामग्री पहुंचाई जा रही हैं। राहत शिविरों में मेडिकल टीमों की तैनाती, फॉगिंग और स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश का आपदा प्रबंधन मुख्यतः राजस्व और स्थानीय प्रशासन आधारित राहत व्यवस्था था। आज इसके साथ प्रशिक्षित एसडीआरएफ, केंद्रीय एजेंसियों से समन्वय, डिजिटल कमांड सेंटर, विस्तृत आपदा सूची, मानकीकृत राहत किट, पशु चारा, महिला केंद्रित राहत और त्वरित आर्थिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं जुड़ चुकी हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा