संस्कृत हमारी भारतीय संस्कृति का मूल : प्रो. मुरली मनोहर पाठक
-ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में साप्ताहिक सम्मेलन का चौथा दिन
गोरखपुर, 27 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद गाेरखपुर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक सम्मेलन में रविवार को चौथे दिन ‘संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति’ विषय विद्वतजन ने विशद चर्चा की।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि गोरखपुर भारतीय संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत ऐतिहासिक नगर है। भारतवर्ष की प्रतिष्ठा संस्कृत और संस्कृति पर ही आधारित है। भारत का जो भी महत्व है, वह इन्हीं दोनों में निहित है। भारत के लिए तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं पहला संस्कृत, दूसरा संस्कार और तीसरा संस्कृति। संस्कृत भाषा किसी के द्वारा बनाई नहीं गई है, यह भाषा सनातन भाषा है। यह भाषा देवभाषा भी है। यही भाषा हमारे संस्कारों की आधारभूत है। जो व्यक्ति संस्कृत भाषा नहीं पढ़ा होता है, वह भी अपना संस्कार संस्कृत में ही पूरा करता है। इन्हीं संस्कारों से संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कारनिष्ठ जीवन शैली को संस्कृति कहा गया। संस्कृति का अनुवाद कल्चर हुआ है, किंतु कल्चर में वह संस्कृति का भाव नहीं है। प्रकृति और प्रत्यय से संस्कृति शब्द निर्मित होकर जो अर्थ देता है, वह कल्चर से कभी नहीं मिल सकता है। वर्तमान सरकार संस्कृत भाषा को सभी भाषाओं के मूल के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए विशेष बजट देकर भारतीय भाषा समिति बनाई है, जो संस्कृत के उत्थान के लिए कार्य करती है।
युद्ध नहीं, बुद्ध की है भारतीय संस्कृति : महंत शिवनाथ
सम्मेलन के मुख्य अतिथि कटक, ओडिशा से पधारे महंत शिवनाथ जी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में सभी जीवों के त्रिविध दुःखों के नाश के लिए किसी मंत्र के अंत में तीन बार शांति, शांति, शांति कहकर पूरा किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गाई गई गीता भारतीय संस्कृति की मूल भावनाओं को हमारे सामने लाती है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में गीता सम्मान के साथ पढ़ी व पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया के कई देश परस्पर युद्ध व संघर्ष से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय संस्कृति उन्हें दिशा देने का कार्य कर सकती है। यही कारण है कि दुनिया हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी से शांति प्रस्ताव लाकर मध्यस्थता करने का आग्रह कर रही है। भारतीय संस्कृति युद्ध की नहीं, अपितु बुद्ध की संस्कृति है। यहां युद्ध के पहले बुद्ध का मार्ग अपनाकर समझाने का पूरा प्रयास किया जाता है। संस्कृत भाषा में कहे गए हमारे आदर्श वाक्य तथा उनमें बताई गई जीवन शैली आज दुनिया को सुख व शांति का पाठ पढ़ा रही है।
संस्कृत हमारी संस्कृति की जड़ : महंत महेंद्रनाथ
हिंगवा, राजस्थान से पधारे महंत डॉ. योगी महेंद्रनाथ जी महाराज ने कहा कि संस्कृत एवं संस्कृति हमारे जीवन जीने का माध्यम है। यही दोनों का अभाव होने के कारण दूसरे देशों के पढ़े-लिखे युवा आतंकवादी बन जाते हैं। हमारी संस्कृति में प्रातःकाल उठकर माता-पिता व गुरुजनों को प्रणाम करना बताया जाता है। यही संस्कार हमें अन्य देशों से अलग करते हैं। जिस किसी वृक्ष के पत्तों, तनों, डालियों को काटने पर भी वृक्ष बचा रहता है, लेकिन उसकी जड़ें काट देने पर वृक्ष सूख जाता है। उसी तरह संस्कृत हमारी संस्कृति का मूल है। यदि हम इसे संरक्षित नहीं करेंगे तो यह देश सूखने लगेगा।
संस्कृत के बिना देश में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होता : महंत लालनाथ जी महाराज
नीमच, मध्य प्रदेश से पधारे महंत लालनाथ जी महाराज ने कहा कि संस्कृत के बिना हमारे देश में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। यह ब्रह्मांड के आदि से ही विद्यमान है। प्राचीन भारत में संस्कृत शास्त्रों के अध्ययन के लिए बड़े-बड़े गुरुकुल स्थापित किए जाते रहे। संस्कृत का पढ़ा-लिखा विद्वान रोजगार पाने के साथ ही सम्मान भी पाता है। संस्कृत पढ़े हुए व्यक्ति में आदर्श भारत का दर्शन होता है। भगवान के सभी अवतारों ने भी गुरुकुल में जाकर संस्कृत के शास्त्रों का अध्ययन किया। संस्कृत पढ़ा हुआ व्यक्ति कभी भी रोजगार के लिए भटकता नहीं है, वह जहाँ रहेगा, वहीं उसे रोजगार प्राप्त हो जाएगा।
हर विषय के साथ संस्कृत अवश्य पढ़ें : महंत राजू दास
हनुमानगढ़ी, अयोध्या के महंत राजू दास जी महाराज ने कहा कि संस्कृति एवं संस्कृत हजारों वर्ष पूर्व से हमारी भारतीय जीवन व्यवस्था को व्यवस्थित रूप देने का कार्य कर रही है। भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव की भावना होने से हमने किसी विदेशी का प्रतिकार नहीं किया। इसी का नाजायज फायदा लेकर मुगलों और अंग्रेजों ने यहाँ शासन किया। यह संस्कृति विश्व कल्याण की कामना करती है, लेकिन अपराधी को उचित दंड देने की भी व्यवस्था देती है। संस्कृति का आधार संस्कृत ही है। इसलिए हम कोई विषय पढ़ें, लेकिन उसके साथ संस्कृत को अवश्य पढ़ें।
विश्वकल्याण की कामना वाली संस्कृति है भारतीय संस्कृति : प्रो. सदानंद
सम्मेलन के विशिष्ट वक्ता एवं पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि प्राचीन भारत का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है। वैदिक काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति विश्व मानवता के लिए आदर्श है। यह संस्कृति संस्कृत भाषा के आदर्शभूत शास्त्रों पर आधारित है। संस्कृति धर्म से अनुप्राणित होती है। भारतीय जनमानस में सनातन धर्म न केवल पूजा-पद्धति तक सीमित है, अपितु प्रातःकाल जागरण से लेकर रात्रि-शयन तक हमारे व्यवहार में समाहित है। भारतीय संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है, जो विश्व कल्याण व शांति की कामना करती है। यह संस्कृति हर तरफ से कल्याणकारी विचारों को ग्रहण करने की भावना रखती है। यह संस्कृति सभी जीवों के साथ ही वृक्षों, नदियों, पर्वतों सहित चराचर जगत में देवत्व की भावना करती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी ने की। आभार ज्ञापन महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के उपाध्यक्ष राजेश मोहन सरकार ने किया। वैदिक मंगलाचरण डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी, गोरक्ष अष्टक पाठ मृत्युंजय उपाध्याय व गौरव तिवारी तथा संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया। इस अवसर पर अयोध्या से पधारे महंत रामबालक दास जी महाराज, महंत रामलखन दास जी महाराज तथा मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ, देवीपाटन के महंत मिथिलेश दास जी महाराज मंच पर उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय