महंत द्वय के आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि : प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा
गोरखपुर, 29 सितंबर (हि.स.)। महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़, गोरखपुर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में महंत द्वय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा एवं स्त्रातजिक अध्ययन विभाग के आचार्य प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि हमारा जीवन केवल कर्मों का परिणाम नहीं, बल्कि ईश्वर की अनुपम देन है। इसलिए प्रातःकाल हम अपने पूर्वजों एवं ईश्वर का स्मरण करते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन स्वयं में सबसे रोचक और प्रेरणादायी विषय है। हम अनेक विषयों का अध्ययन करते हैं, लेकिन अपने साथियों, पूर्वजों और महापुरुषों के जीवन को पढ़ने का प्रयास कम करते हैं। विद्यार्थियों को अपने वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए निर्धारित लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी महान व्यक्तित्व की श्रद्धांजलि सभा तभी सार्थक होती है, जब हम उस महापुरुष के कम से कम एक गुण को अपने जीवन में आत्मसात करें। पितृपक्ष में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा गोरक्षपीठ के पूज्य महंत द्वय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से प्रेरणा लेकर जीवन में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है।
महंत दिग्विजयनाथ जी के योगदान को रेखांकित करते हुए प्रो. सिन्हा ने कहा कि परतंत्र भारत में जब देशवासी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस समय महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता को समझा, जो भारतीयता और राष्ट्रभावना को सुदृढ़ कर सके। उन्होंने दूरदर्शी सोच के साथ युवाओं में शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय चेतना के संस्कार विकसित करने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य से वर्ष 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की गई।
महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना जीवन दलितों, पीड़ितों और निराश्रितों के उत्थान के लिए समर्पित किया। महंत दिग्विजयनाथ जी द्वारा रोपे गए महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के पौधे को उन्होंने निरंतर पोषित किया और उसकी सेवा परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि इसी यशस्वी परंपरा का निर्वहन वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी महाराज कर रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में दिखाई देने वाली विराटता और सेवा-भावना गुरु-परंपरा से प्राप्त संस्कारों का परिणाम है।
चरित्र, अनुशासन और सेवा को जीवन का आधार बनाएं युवा : स्वामी अनिरुद्धानन्द गिरि
अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वामी अनिरुद्धानन्द गिरि जी महाराज ने कहा कि महापुरुषों की पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का अवसर है। महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने राष्ट्र और समाज के लिए शिक्षा एवं संस्कार की जो आधारशिला रखी तथा महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने सेवा, समरसता और वंचितों के उत्थान के माध्यम से जिस परंपरा को आगे बढ़ाया, वह आज भी समाज को दिशा प्रदान कर रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर चरित्र, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मनीष कुमार त्रिपाठी ने कार्यक्रम में अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। संचालन बी.एस.सी. प्रथम सेमेस्टर की छात्रा सृष्टि विश्वकर्मा ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय