गोसेवा से ही प्रकृति, संस्कृति और मानव जीवन की रक्षा संभव : स्वामी राजेंद्रदास
-ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज तथा ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में सम्मेलन
गोरखपुर, 28 सितंबर (हि.स.)। युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक सम्मेलन की श्रृंखला में सोमवार को ‘भारतीय संस्कृति एवं गो सेवा’ विषय पर विद्वानों एवं संतों ने गहन विमर्श-मंथन किया। सम्मेलन में गोसेवा को भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, कृषि और मानव जीवन के कल्याण का आधार बताते हुए घर-घर गो सेवा को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया।
सम्मेलन के मुख्य अतिथि वृंदावनधाम से पधारे श्रीमद् जगद्गुरु द्वाराचार्य, अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि जिस पीठ के नाम के साथ ही गोरक्षा शब्द जुड़ा हुआ है, वहां गोसेवा पर चर्चा करना और संतों का मार्गदर्शन प्राप्त करना सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि गोसेवा से ही प्रकृति, संस्कृति और मानव जीवन की रक्षा संभव है। स्वामी जी ने कहा कि भगवान की श्रेष्ठ रचना मनुष्य ने ही भगवान की सुंदर प्रकृति को विषैला बनाया है। मनुष्य केवल स्थूल चीजों का चिंतन करता है, सूक्ष्म चीजों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता। हमें यह समझना होगा कि यदि सूक्ष्म का विनाश होगा तो स्थूल की सत्ता भी संभव नहीं है। हमारे ऋषियों ने गोमाता के महत्व को इसी दृष्टि से समझाया है। गोमाता हमारी स्थूल प्रकृति के साथ-साथ सूक्ष्म प्रकृति की भी रक्षा करती हैं।
राजेंद्रदास जी ने कहा कि हमारे शरीर में स्थित सूक्ष्म बुद्धि और मन को भी गो माता शुद्ध करती हैं। संपूर्ण सूक्ष्म और स्थूल प्रकृति को विषाक्तता से मुक्त करने का सामर्थ्य हमारी वेद-लक्षणा देशी गो माता में है। आज के पर्यावरणीय असंतुलन को गो सेवा के माध्यम से रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में प्राचीन ऋषियों का बहुत महत्व है और हम ऋषि ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते। ऐसे ऋषियों से भी श्रेष्ठ यदि कोई है तो वह गो माता ही हैं। गोबर तथा गोमूत्र को खेतों में डालने से ऊसर भूमि भी उपजाऊ हो सकती है और उस भूमि में उत्पन्न अन्न बल एवं आयु को बढ़ाने वाला होता है। उन्होंने कहा कि संपूर्ण वैदिक संस्कृति, ऋषि संस्कृति, देव संस्कृति तथा प्रकृति-पर्यावरण का मूल गो माता हैं। नर गोवंश की हत्या धर्म की हत्या है और गो रक्षा धर्म की रक्षा है। गोरक्षपीठ की महान ऊर्जा का एक प्रमाण यह भी है कि परिसर में लगभग साढ़े पांच सौ शुद्ध देशी गायों की सेवा होती है। स्वामी जी ने कहा कि किसान देश का अन्नदाता है। उन्होंने कहा कि जो लोग धर्माचार्य होकर भी गोरक्षा के नाम पर वर्तमान सरकार का विरोध करते हैं और गोरक्षा के विरोधियों का साथ देते हैं, वे गोभक्त नहीं हो सकते।
विष के शमन का श्रेष्ठ साधन गोमाता से प्राप्त गव्य पदार्थ : श्याम बिहारी गुप्ता
सम्मेलन के मुख्य वक्ता उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि समुद्र मंथन से निकले रत्नों में एक विष था और दूसरा कामधेनु। विष के शमन का श्रेष्ठ साधन गो माता से प्राप्त गव्य पदार्थ हैं। गो माता धरती के समस्त प्राणियों की रक्षा करती हैं। उन्होंने कहा कि देशी गो माता के दूध और घी के सेवन से हमारे भोजन में मौजूद विषाक्त तत्वों के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।
गोरक्षपीठ सदैव गोरक्षा के लिए तत्पर : स्वामी विद्या चैतन्य
नैमिषारण्य से पधारे स्वामी विद्या चैतन्य जी महाराज ने कहा कि गोरक्षपीठ भारतवर्ष की ऐसी पीठ है, जहां महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के समय से ही गोरक्षा और हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए निरंतर कार्य होता रहा है। उन्होंने कहा कि आज गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी पूरे प्रदेश में गोरक्षा और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं। इन दोनों की रक्षा से ही भारत देश की रक्षा संभव है।
गोमाता नहीं होतीं तो गंगा भी पृथ्वी पर नहीं होतीं : भरतदास
अयोध्या से पधारे स्वामी बाल भरतदास जी महाराज ने कहा कि पृथ्वी पर यदि गोमाता नहीं होतीं तो गंगा भी यहां नहीं बहतीं। सूर्यवंशी राजाओं के जीवन में गो सेवा की प्रधानता रही है। उन्होंने कहा कि गंगा का जल और गाय का दूध पीने वाला व्यक्ति कभी अपने देश और समाज के साथ गद्दारी नहीं कर सकता। जब तक देश में गो माता के वध पर पाबंदी नहीं लगेगी, तब तक देश विश्वगुरु नहीं बन सकता।
गोमाता का सूर्य की किरणों से साक्षात संबंध : प्रो. कमलनाथ
श्रृंगेरी मठ, कर्नाटक से पधारे प्रो. कमलनाथ जी ने कहा कि गोमाता अपने ककुद के माध्यम से सूर्य के स्वर्ण तत्व को संग्रह करती हैं और उसे अपने दूध के माध्यम से प्रदान करती हैं। इसलिए गाय का दूध पीले वर्ण का होता है। उन्होंने कहा कि गोमाता के दूध के सेवन से दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन प्राप्त करने में सहायता मिलती है। गोमूत्र सहित गव्य पदार्थों के समुचित उपयोग से आर्थिक समृद्धि के नए अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ‘गो’ शब्द का एक अर्थ किरण भी होता है और सूर्य की किरणों से गाय का संबंध माना गया है।
गोमाता के दर्शन से सभी देवी-देवताओं के दर्शन का पुण्य: लालमणि त्रिपाठी
विशिष्ट वक्ता एवं गीताप्रेस, गोरखपुर के प्रबंधक लालमणि त्रिपाठी ने कहा कि गोमाता के दर्शन मात्र से सभी देवी-देवताओं के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। हमारी संस्कृति में गाय कोई सामान्य पशु नहीं है। जिस प्रकार तुलसी सामान्य वनस्पति नहीं, बल्कि लक्ष्मी स्वरूपा मानी जाती हैं, उसी प्रकार गोमाता को साक्षात् देवताओं का स्वरूप माना गया है। उन्होंने कहा कि गो माता से हमारे सांसारिक जीवन के कार्य तो संपन्न होते ही हैं, साथ ही पारलौकिक कार्य भी संपन्न होते हैं। गोमाता के दर्शन, स्पर्श और चरण वंदन से मानव जीवन के सभी पुरुषार्थों की सिद्धि होती है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी ने की। वैदिक मंगलाचरण डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी ने किया। मृत्युंजय उपाध्याय एवं गौरव तिवारी ने गोरक्ष अष्टक का पाठ किया। संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया। इस अवसर पर गुजरात से पधारे महंत कमलनाथ जी महाराज, कटक, ओडिशा से पधारे महंत शिवनाथ जी महाराज, हनुमानगढ़ी, अयोध्या से महंत राजूदास जी महाराज तथा नीमच, मध्य प्रदेश से पधारे महंत योगी लालनाथ जी महाराज सहित अनेक संत-महात्मा मंच पर उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय