गंगा की लहरों से निकली ‘गोल्डन गर्ल’ अर्चना, राज्यस्तरीय तैराकी में जीते पांच स्वर्ण

 


- भाई को भी सिखा रही तैराकी, अब ओलंपिक में देश का नाम रोशन करने का सपना

मीरजापुर, 02 सितंबर (हि.स.)। हौसले मजबूत हों तो अभाव भी मंजिल की राह नहीं रोक सकते। सीखड़ की अर्चना निषाद ने अपनी मेहनत और जुनून से इस बात को सच साबित कर दिखाया है। संसाधनों की कमी के बावजूद गंगा की लहरों में तैराकी सीखने वाली अर्चना ने राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पांच स्वर्ण पदक जीतकर न केवल अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, बल्कि पूरे क्षेत्र का मान भी बढ़ाया है। अब उसकी नजर ओलंपिक जैसी विश्वस्तरीय प्रतियोगिता में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने पर है।

सीखड़ के ईश्वर पट्टी स्थित अपने ननिहाल में रहकर बीए अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रही अर्चना मूल रूप से मीरजापुर के गांगपुर की रहने वाली है। गरीब परिवार में जन्मी अर्चना के पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। बचपन से ही उसके नाना-नानी ने उसका पालन-पोषण किया। करीब दस वर्ष पहले गंगा किनारे रहते हुए अर्चना ने तैराकी सीखने का संकल्प लिया। शुरुआत में वह प्रतिदिन करीब दो घंटे गंगा में अभ्यास करती थी।

अपने हुनर को निखारने के लिए अर्चना ने वर्ष 2019-20 में लखनऊ के बाबू केडी सिंह स्टेडियम में दो वर्ष तक प्रशिक्षण लिया। वहां रहने और प्रशिक्षण का खर्च करीब एक से डेढ़ लाख रुपये सालाना होने के कारण उसे वापस गांव लौटना पड़ा। लेकिन परिस्थितियां उसके जुनून को नहीं डिगा सकीं। गांव लौटने के बाद भी वह सुबह दो घंटे और शाम को दो घंटे गंगा में तैराकी का अभ्यास करती रही। हाल ही में 30 अगस्त से एक सितंबर तक वाराणसी के सिगरा में आयोजित सीनियर समन्वय राज्यस्तरीय तैराकी प्रतियोगिता में अर्चना ने 50, 100 और 200 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक जीते। इसके अलावा 200 और 400 मीटर आईएम वर्ग में भी उसने स्वर्ण पदक हासिल किया।

अर्चना की सफलता केवल उसकी अपनी नहीं है। तीन बहनों और एक भाई में से अर्चना अपने छोटे भाई हरिओम को भी तैराकी का अभ्यास कराती है। वाराणसी की इसी प्रतियोगिता में हरिओम ने 100 मीटर फ्रीस्टाइल पुरुष वर्ग में रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। अर्चना का सपना है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करे और ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करे। उसकी कहानी यह संदेश देती है कि सुविधाएं कम हों तो भी मेहनत, लगन और हौसले के दम पर सपनों को उड़ान दी जा सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा