आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति का प्रहरी बना श्री द्वारिकाधीश लोक संस्थान
जौनपुर, 28 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर में आधुनिकता की चकाचौंध के बीच बक्शा विकास खंड के चुरावनपुर स्थित ‘श्री द्वारिकाधीश लोक संस्थान’ बीते 40 वर्षों से मौन साधक की तरह पूर्वांचल की लोक संस्कृति की जड़ों को सींच रहा है। यह संस्थान न केवल अवधी लोकगीतों को जीवित रखे हुए है, बल्कि उन्हें सात समंदर पार फिजी और सूरीनाम में बसे भारतीय परिवारों तक भी पहुंचा रहा है।
संस्थान के अध्यक्ष एवं वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मनोज मिश्र ने इस कार्यक्रम के बारे में शनिवार को हिंदुस्थान समाचार प्रतिनिधि काे बताया कि पूर्वांचल के बड़ी संख्या में गिरमिटिया श्रमिक फिजी और सूरीनाम में बसे हैं, जिनकी रग-रग में आज भी भारतीय संस्कृति जीवित है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों से वे आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। संस्थान की स्थापना चार दशक पूर्व चिकित्सक स्वर्गीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने की थी। उनका उद्देश्य गांव की मिट्टी से जुड़े चौताल, उलारा, डेढ़ ताल, बेलवइया, फगुआ, चहका, धमार और चैता जैसी लोकविधाओं को संरक्षित करना था। स्वर्गीय वंशराज सिंह, बैजनाथ सिंह और पंचदेव सिंह ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रो. मिश्र कहते हैं कि आज होली के नाम पर प्रचलित कई गीत परिवार के साथ सुनने योग्य नहीं रह गए हैं, जबकि पारंपरिक फागुनी गीतों में प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का सहज चित्रण मिलता है। “बनन में कोयल कागा बोले” और “घरवन वन में गौरैया चहचहानी” जैसे गीत प्रकृति से जुड़ाव का संदेश देते हैं। प्रो. मनोज मिश्र और उनकी टीम इस सांस्कृतिक मशाल को आगे बढ़ा रही है। सुजियामऊ निवासी श्रीपति उपाध्याय, पंडित रामसकल दूबे, त्रिवेणी पाठक, कैलाश शुक्ल, प्रज्ञाचक्षु बाबू बजरंगी सिंह, बड़कऊ उपाध्याय और सत्यनाथ पांडेय जैसे लोक साधक इस प्रयास में सक्रिय हैं।
संस्थान ने आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए दुर्लभ लोकगीतों को यूट्यूब पर उपलब्ध कराया है, जिससे देश-विदेश में बसे भारतीय अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रह सकें। संस्थान का संकल्प है कि यह समृद्ध परंपरा कभी विलुप्त न होने पाए।
हिन्दुस्थान समाचार / विश्व प्रकाश श्रीवास्तव