भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने का प्रयास किया आक्रांताओं ने, अब सभी धरोहरों के संरक्षण का समय: मुख्यमंत्री

 




-युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में साप्ताहिक आयोजन का पहला दिन

प्राचीन काल मे हर क्षेत्र में अद्भुत व सर्वश्रेष्ठ था भारत का ज्ञान : मुख्यमंत्री

ज्ञान परंपरा को पहचानकर, सप्रमाण दुनिया के सामने रखना होगा : सीएम योगी

गोरखपुर, 24 सितंबर (हि.स.)। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने न सिर्फ भारत का वैभव लूटा, बल्कि उसकी ज्ञान परंपरा और बुद्धि को भी नष्ट करने का प्रयास किया। मंदिरों पर हमले आक्रांताओं की इसी सोच का हिस्सा थे। ब्रिटिश काल में सिर्फ इस प्रयास का तरीका बदला। ब्रिटिशर्स ने भ्रम पैदा कर भारतीयों को उनकी परंपरा, मूल्यों और जड़ों से काटने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अब अपनी ज्ञान परंपरा को पहचानने, उसे प्रमाणों के साथ दुनिया के सामने रखने और आधुनिक तकनीक से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का समय है।

मुख्यमंत्री योगी गुरुवार को युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में समसामयिक विषयों पर सम्मेलन श्रृंखला के पहले दिन ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान परिप्रेक्ष्य’ विषयक सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे। गोरखनाथ मंदिर परिसर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में आहूत सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर, प्राचीन से लेकर वर्तमान परिदृश्य का विशद शब्द चित्र खींचा। उन्होंने रामायण काल में दंडकारण्य में ऋषियों के आश्रमों पर हमलों का उल्लेख करते हुए कहा कि राक्षसी और दानवी शक्तियां हों या विदेशी आक्रांता, भारत पर हमले का उद्देश्य वैभव लूटने के साथ उसकी ज्ञान धरोहर को नष्ट करना भी रहा। उन्होंने सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण की चर्चा करते हुए कहा कि मंदिर को तोड़ने का उद्देश्य केवल लूटपाट नहीं, बल्कि सनातन परंपरा को नष्ट करना भी था।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि ब्रिटिश काल में तरीका बदल गया। भारतीयों को अपनी भाषा, चिकित्सा पद्धति और ज्ञान परंपरा को लेकर भ्रमित किया गया। संस्कृत के स्थान पर अंग्रेजी और परंपरागत चिकित्सा पद्धति के स्थान पर आधुनिक चिकित्सा को महत्व दिया गया। परिणाम यह हुआ कि हम धीरे-धीरे अपनी परंपरा, मूल्यों और जड़ों से कटते गए।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्राचीन कालखंड में भारत का ज्ञान हर क्षेत्र में अद्भुत और सर्वश्रेष्ठ था। भाषा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, आयुष, ज्योतिष, शिल्प, तकनीकी आदि जो भी क्षेत्र हैं, भारत के प्राचीन विश्वविद्यालयों ने उसी तरह के श्रेष्ठ स्नातक दिए। भारत की इस समृद्ध ज्ञान परंपरा को संरक्षित करके हम लोक मंगल के उद्देश्य से दुनिया को बहुत कुछ दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को पाणिनि, पतंजलि, आयुर्वेद के आचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र जैसी विरासत से परिचित कराना होगा। करीब तीन हजार वर्ष पहले नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषि श्रवण परंपरा से प्राप्त ज्ञान को लिपिबद्ध करने के लिए एकत्र हुए थे।

भूत, वर्तमान और भविष्य के मुद्दों पर सदैव चिंतन किया भारत के विद्वानों ने

मुख्यमंत्री योगी ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों, ‘हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भूत, वर्तमान और भविष्य के मुद्दों को लेकर भारत के विद्वानों ने हमेशा से चिंतन किया है। चिंतन की उसी परंपरा को ध्यान में रखकर भारतीय ऋषि परंपरा सदैव अपनी धरोहर को किसी न किसी रूप में संरक्षित भी करती रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि दुनिया के अंदर अकेले भारतीय समाज ही है जिसने ज्ञान को केवल अक्षर सीखने या भौतिक उपलब्धियों की प्राप्ति सीमित नहीं रखा। भारत की परंपरा ने विद्या को मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माध्यम माना है।

ज्ञान की परंपरा से ही विश्व गुरु कहलाता था भारत

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे अच्छी जलवायु, सबसे अच्छी उर्वरा भूमि, सबसे अच्छा जल संसाधन है। सबकुछ होने के बाद भी भारत यदि विश्व गुरु कहलाता था तो ज्ञान की अपनी परंपरा के कारण। ज्ञान की धरोहर पर एकाधिकार हमारा था। उन्होंने कहा कि आज के कई विकसित देशों का इतिहास 400 से 500 वर्षों का है, जबकि भारत में 2600 वर्ष पहले तक्षशिला और करीब 1700 से 1800 वर्ष पहले नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे। काशी, उज्जैन, कांची भी ज्ञान के प्रमुख केंद्र रहे। उन्होंने कहा कि कुंभ केवल स्नान का आयोजन नहीं था। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर में संत और विद्वान अपने शोध और नवाचार पर चर्चा करते थे। भारतीय समाज ने अपने पर्व, त्योहार और मांगलिक कार्यों को आज भी भारतीय हिंदू पंचांग से जोड़ रखा है।

ज्ञान परंपरा के संरक्षण को प्रेरित किया पीएम मोदी ने

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को भारत की ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उसी क्रम में भारत के अंदर जहां-तहां बिखरी पड़ी प्राचीन पांडुलिपियों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों और चर्मपत्रों को संरक्षित करने की बात प्रारंभ हुई। आधुनिकता के मोह में पड़ा हुआ समाज, परिवार उनके महत्त्व को नहीं समझ पा रहा था। आज जब उस पर कार्य हो रहा है और उनके बारे में जब लोग जानने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, अब उसका महत्व सबकी समझ में आ रहा है।

एक लाख से अधिक पांडुलिपियों का हो रहा संरक्षण

मुख्यमंत्री योगी ने बताया कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय काशी में एक लाख से अधिक प्राचीन पांडुलिपियां एकत्र की गई हैं और उनके संरक्षण तथा डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है। परिवारों, विद्वानों के घरों, प्राचीन मठों और मंदिरों में भी ऐसी ज्ञान धरोहर मौजूद है। अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन और लखनऊ समेत विभिन्न स्थानों पर पांडुलिपियां, ताम्रपत्र और शिलालेख मिले हैं।

वर्तमान पीढ़ी को ज्ञान-धरोहर से अवगत कराने का उपयुक्त समय

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज अपनी ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए, भारत को भारतीयता का एहसास कराने के लिए भारत के अंदर भारतीय ज्ञान परंपरा की शोध पीठ की स्थापना का कार्य फिर से प्रारंभ हुआ है। उन्होंने शिक्षण संस्थानों का आह्वान करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े हुए उन सभी धरोहरों के संरक्षण के लिए वर्तमान पीढ़ी को अवगत कराने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय है।

ब्रह्मलीन महंत द्वय को नमन कर हुआ सम्मेलन का शुभारंभ

सम्मेलन का शुभारंभ युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के चित्रों पर पुष्पांजलि से हुआ। दिग्विजय स्त्रोत पाठ डॉ. अभिषेक पांडेय, महंत अवेद्यनाथ स्त्रोत पाठ डॉ. प्रांगेश कुमार मिश्र, वैदिक मंगलाचरण अश्विनी त्रिपाठी और गोरक्ष अष्टक पाठ मृत्युंजय व गौरव पांडेय ने किया। मुख्य वक्ता, आईआईटी बीएचयू के आचार्य डॉ. वी. रामनाथन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित अपनी चार पुस्तकों का सेट भेंट किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया।

इस अवसर पर वृंदावन से मलूकपीठाधीश्वर, अग्रपीठाधीश्वर द्वाराचार्य स्वामी राजेंद्रदास जी महाराज, जूनागढ़ गुजरात से महंत शेरनाथ जी महाराज, काशी से जगद्गुरू श्री विष्णुस्वामी संप्रदायाचार्य श्रीसंतोषाचार्य 'सतुआ बाबा' जी महाराज, श्रीदुग्धेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर गाजियाबाद के पीठाधीश्वर महंत नारायण गिरि जी, हनुमानगढ़ी अयोध्याधाम से महंत राजूदास जी, जबलपुर से स्वामी नरसिंहदास जी महाराज, अयोध्याधाम से महंत रामबालकदास जी महाराज, कटक उड़ीसा से महंत शिवनाथ जी महाराज, भारत साधु समाज से पटना से स्वामी केशवानंद जी महाराज, तपसीधाम बस्ती से महंत जय बक्शदास जी, उज्जैन मध्य प्रदेश से पधारे पीर रामनाथ जी, दिगम्बर अखाड़ा अयोध्याधाम से पधारे महंत रामलखनदास जी, देवीपाटन मंदिर बलरामपुर से महंत मिथिलेशनाथ जी महाराज, कालीबाड़ी गोरखपुर के महंत रविंद्रदास जी महाराज आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय