बीएचयू में उच्च जोखिम वाले नवजातों की निगरानी और प्रारंभिक हस्तक्षेप पर कार्यशाला, हेल्प परियोजना शुरू

 


वाराणसी, 17 अक्टूबर (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग की नियोनेटोलॉजी इकाई ने शनिवार को उच्च जोखिम वाले नवजात शिशुओं की निगरानी, प्रारंभिक हस्तक्षेप और दुर्लभ रोगों की पहचान के उद्देश्य से हेल्प परियोजना का शुभारंभ किया। इस अवसर पर सर सुंदरलाल अस्पताल के डॉक्टर्स लाउंज में ‘हाई-रिस्क फॉलो-अप एंड अर्ली इंटरवेंशन’ विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम सह कार्यशाला आयोजित की गई। इसे नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम (एनएनएफ) इंडिया, किम्स हेल्थ सीएसआर और एनएनएफ वाराणसी का सहयोग मिला।

कार्यक्रम में एनआईसीयू, बीएचयू द्वारा तैयार पुस्तक ‘फॉलो-अप ऑफ हाई-रिस्क नियोनेट्स बाय नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट’ का विमोचन भी किया गया।

बीएचयू कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर तीन से 35 तक है। उन्होंने नवजात मृत्यु दर के कारणों को समझने और नवजात देखभाल के क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान संस्थान को क्षेत्रीय आदर्श के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।

चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आधुनिक चिकित्सा संकाय के संकाय प्रमुख प्रो. संजय गुप्ता ने कहा कि उच्च जोखिम वाले नवजातों में विकास संबंधी समस्याओं की समय रहते पहचान, उचित हस्तक्षेप और नियमित निगरानी जरूरी है। इससे सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म और विकासात्मक विलंब जैसी स्थितियों के दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है। सर सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. पुनीत ने भी बेहतर उपचार परिणामों के लिए समय पर निदान और प्रारंभिक हस्तक्षेप को आवश्यक बताया।

आईएमएस के अनुसंधान संकाय प्रमुख प्रो. मनोज पांडेय ने आनुवंशिक और चयापचय संबंधी विकारों, विशेषकर दुर्लभ रोगों के निदान एवं प्रबंधन की चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि हेल्प परियोजना संदिग्ध मामलों की पहचान में बाल रोग विशेषज्ञों और नियोनेटोलॉजिस्ट को मार्गदर्शन देगी। साथ ही, दुर्लभ रोगों की वास्तविक व्यापकता जानने के लिए जनसंख्या-आधारित अध्ययनों की आवश्यकता बताई।

एनएनएफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. ललन के. भारती ने पिछले तीन दशकों में नवजात शिशुओं की जीवन रक्षा के क्षेत्र में भारत की प्रगति का उल्लेख किया। किम्स हेल्थ की सीएसआर प्रमुख एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी रेश्मी आयशा ने दुर्लभ रोगों के निदान और उपचार के लिए बेहतर समन्वय, तकनीकी विशेषज्ञता तथा वित्तीय सहायता की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि एनएनएफ-किम्स हेल्थ पहल के तहत अब तक 11 राज्यों के 90 मरीजों को सहायता दी जा चुकी है।

बाल रोग विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं एनआईसीयू प्रभारी प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि आनुवंशिक और चयापचय संबंधी विकार नवजात मृत्यु के कारणों में शामिल हैं, लेकिन कई मामलों में इनकी पहचान नहीं हो पाती और उपचार भी नहीं मिल पाता। उन्होंने नवजातों के मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टिसिटी का लाभ उठाकर विकासात्मक परिणाम बेहतर बनाने में एनआईसीयू देखभाल के महत्व को रेखांकित किया। किम्स हेल्थ, तिरुवनंतपुरम के समन्वयक एवं वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. नवीन जैन ने दुर्लभ रोगों के निदान में मौजूद कमियों पर प्रकाश डाला।

आयोजन सचिव डॉ. अनु शर्मा ने बताया कि एनएनएफ इंडिया की हेल्प परियोजना किम्स हेल्थ सीएसआर के सहयोग से संचालित होगी। इसके तहत दुर्लभ आनुवंशिक या चयापचय संबंधी विकारों से ग्रस्त होने की आशंका वाले नवजातों को विशेषज्ञ मार्गदर्शन और निःशुल्क निदानात्मक जांच उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो. अंकुर सिंह ने स्वागत संबोधन में कहा कि दुर्लभ रोगों से संबंधित देखभाल की जरूरत ने इस कार्यशाला की परिकल्पना को प्रेरित किया। इससे स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, चिकित्सकों और पैरामेडिकल कर्मचारियों के ज्ञान एवं कौशल को मजबूत करने के साथ इंडिया न्यूबॉर्न एक्शन प्लान के तहत नवजात मृत्यु दर को एकल अंक तक लाने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। डॉ. दिव्या सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

कार्यशाला में बाल रोग विशेषज्ञों, नियोनेटोलॉजिस्ट, रेजिडेंट चिकित्सकों और एनआईसीयू नर्सिंग अधिकारियों सहित कुल 45 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। अकादमिक सत्रों में विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ एनआईसीयू में देखभाल, अस्पताल से छुट्टी के बाद नियमित निगरानी एवं फॉलो-अप और ऑक्यूपेशनल थेरेपी के जरिए प्रारंभिक हस्तक्षेप का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।----------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी