यूजीसी को लेकर फैलाई जा रही है भ्रांतियां, बहाली की मांग लेकर तेज होगा आंदोलन : डॉ कमल उसरी

 


बहुजनों को सब कुछ संविधान से मिला : के.सी. सरोज

प्रयागराज, 08 अप्रैल (हि.स.)। यूजीसी को लेकर महज डेढ़ प्रतिशत लोग विरोध कर रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान सामाजिक एवं न्याय की बात करता है। लेकिन अफसोस है कि संविधान लागू होने के इतने वर्ष बाद भी सामंती और वर्ण-व्यवस्था के पोषक तत्व अभी भी गैर बराबरी मानसिक और सामाजिक गुलामी बनाएं रखते हुए सामाजिक न्याय युक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समानता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित सभ्य समाज नहीं बनने देना चाहते हैं। यह बातें बुधवार को मीडिया से पूर्व आईएएस केसी सरोज एवं यूजीसी एक्ट बचाओ समता आंदोलन के संयोजक डॉ कमल उसरी ने कही।

उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की रूपरेखा तैयार की है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि कई अभ्यर्थियों ने अपनी शिकायतें संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई हैं, लेकिन संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती है। इसी के चलते छात्रों में असंतोष बढ़ रहा है।

आंदोलनकारियों ने सरकार और संबंधित एजेंसियों से मांग की है कि प्रभावित छात्रों को न्याय दिया जाए।

छात्र संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र आलोक अम्बेडकर ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेद भाव करते हुए बिना किसी ठोस कारण के ही एमएनआईटी के एक शिक्षक को सस्पेंड कर दिया गया। हालांकि छात्रों के आन्दोलन के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया। डॉ कमल उसरी ने कहा कि यूजीसी एक्ट के तहत ईडब्ल्यूएस छात्र, एससी एसटी, ओबीसी, महिलाओं, दिव्यांग को शामिल किया गया है। इस तरह एक्ट के तहत महज डेढ़ प्रतिशत लोग बाहर हैं, जो यूजीसी का विरोध कर रहे हैं, वह ऐसे लोग हैं जिनकी मानसिकता भेदभाव, ऊंच-नीच को बढ़ावा देना है। उनका जाति भेद भाव में विश्वास करते हैं और वहीं लोग विरोध कर रहे हैं। जबकि देश के संविधान में सभी को संरक्षित किया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल